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गुरुवार, 16 जून, 2005 को 14:24 GMT तक के समाचार

यूरोपीय बजट से जुड़े मसले

गुरुवार से ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ की दो दिवसीय बैठक हो रही है जिसमें बजट और संविधान को लेकर बहस होनी है और उम्मीद की जा रही है किसी समझौते की.

यूरोपीय संघ का बजट पेचीदा मामला है जिसमें हर देश को आपत्तियां हैं और वो अपने स्तर पर इसे फायदेमंद बनाना चाहते हैं.

फिलहाल ये बजट के एक ढांचे पर बहस हो रही है. 2007 से लेकर 2013 के लिए ये बजट बन रहा है और इसमें तय होगा कि किस विभाग को कितने पैसे खर्च करने के लिए दिए जाएंगे.

बहस इस बात को लेकर है कि पूरा खर्च कितना हो और विभिन्न विभागों मसलन, विदेश, वित्त, कृषि में कितना कितना पैसा दिया जाएगा.

यूरोपीय आयोग चाहता है कि यूरोपीय संघ का कुल खर्चा सात सालों में एक ख़रब यूरो का हो जिसका समर्थन यूरोपीय संघ के ऐसे देश कर रहे हैं जो थोड़े ग़रीब कहे जा सकते हैं.

दूसरी तरफ़ यूरोपीय संघ के बजट के लिए पैसा देने वाले बड़े देश यानी ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया चाहते हैं कि ये खर्च 815 अरब यूरो हो.

ब्रिटेन को रियायत

यूरोपीय संघ के बजट के लिए सारे सदस्य देश पैसे देते हैं और फिर हर साल उन्हें यूरोपीय संघ से पैसे मिलते हैं.

संघ में ब्रिटेन एकमात्र ऐसा देश है जो कम पैसे देता है और उसे अधिक पैसे वापस मिलते हैं यानी रियायत मिलती है.

1984 में ब्रिटेन को रियायत देने पर समझौता हुआ था. उस समय ब्रिटेन यूरोप का तीसरा सबसे ग़रीब देश था.

इसके अलावा ब्रिटेन में कृषि योग्य भूमि कम है तो उसे यूरोपीय संघ से कृषि क्षेत्र में सबसे कम मदद मिलती है. जबकि दूसरे देशों को इस क्षेत्र में संघ से काफ़ी मदद दी जाती है.

रियायत मिलने का दूसरा कारण है ब्रिटेन में आयात अधिक होता है.

अगर रियायत न मिले तो यूरोपीय संघ को पैसा देने वाले देशों में ब्रिटेन का नंबर पहला हो जाता है.

ब्रिटेन इस रियायत को जारी रखना चाहता है जबकि अन्य देश चाहते हैं कि ब्रिटेन को दी जाने वाली रियायत ख़त्म कर दी जाए. अ

अन्य देश ये भी कहते हैं कि अब ब्रिटेन में 1984 वाली स्थिति भी नहीं है.

अन्य देशों की आपत्तियां

हर देश यह चाहता है जो पैसा उन्हें दिया जाता है बजट में वो तो कम बिल्कुल न किया जाए.

रियायत को लेकर ब्रिटेन अड़ा हुआ है. उसी तरह फ्रांस अपने किसानों को निराश नहीं करना चाहता जिन्हें यूरोपीय संघ से भारी सब्सिडी मिलती है.सब्सिडी पर वो कोई समझौता नहीं करना चाहते.

नीदरलैंड्स अब संघ को उतने पैसे देना नहीं चाहता जितना वो दे रहा है. वो अपने पैसे कम करने पर अड़ा है.

लक्ज़मबर्ग का कहना है कि रोमानिया और बुल्गारिया जैसे देशों को 2007 से इसी बजट से फार्म सब्सिडी दी जाए न कि अलग फंड से जिसे फ्रांस मानने को तैयार नहीं है.

इसके अलावा स्पेन, पुर्तगाल, ग्रीस और मध्य यूरोप के देश यूरोप के ही कम संपन्न देशों को दी जाने वाली मदद में कटौती का विरोध कर सकते हैं.

सहमति कितनी ज़रुरी

विवादों को देखते हुए सहमति बननी मुश्किल लगती है लेकिन राजनीतिक दृष्टि से सहमति होना बहुत ज़रुरी है.

यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि संविधान के मसौदे को फ्रांस और नीदरलैंड के लोगों ने नकार दिया है.

अगर बजट पर सहमति हुई तो संदेश जाएगा कि यूरोपीय संघ संकट से निकल सकता है लेकिन सहमति नहीं बनी तो संकट के बादल और गहरा जाएंगे.