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रविवार, 03 अप्रैल, 2005 को 20:23 GMT तक के समाचार

सुशील झा
बीबीसी संवाददाता

जब पोप को नहीं देख सका...

पिछले साल दिसंबर महीने में रोम घूमने गया तो पोप को देखने का ख्याल कभी भी मेरे मन में नहीं था लेकिन वेटिकन के सेंट पीटर बैसिलिका में जब मेरे गाइड ने एक आमंत्रण पत्र दिया तो लगा कि पोप जॉन पॉल द्वितीय को देख सकूंगा.

दुनिया के विभिन्न धर्मों में आध्यात्मिक गुरु हैं लेकिन किसी भी धार्मिक नेता को इतनी शक्ति नहीं है जितनी पोप के पास होती है. न ही किसी एक धार्मिक नेता पर इतने अधिक लोगों की आस्था है.

दुनिया भर में एक अरब से अधिक कैथोलिकों के धार्मिक नेता हैं पोप.

वो भी तब जब पोप जॉन पॉल द्वितीय जैसा हो यानी राजनीति में रुचि रखने वाला और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर अपनी रुढ़िवादी विचारधारा का प्रसार करने वाला.

ऐसा पोप जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता यानी अमरीकी राष्ट्रपति को भी सीख देने से नहीं चूकता.

सेंट पीटर गिरजाघर में कई पुराने पोप की तस्वीरें देखीं और उनके बारे में जाना. सन् 1000 के पोप फोरमेनसस से लेकर पोप जॉन पॉल द्वितीय तक के बारे में.

हर पोप के बारे में अलग अलग कहानियां. कोई पोप वारियर पोप के नाम से प्रसिद्ध हैं ( चूंकि वो लड़ाईयों में खूब हिस्सा लेते थे). तो किसी को मुस्कराने वाले पोप ( पॉल I) के नाम से जाना जाता है.

किसी पोप को जहर दिया गया तो किसी पोप के शव को लोगों ने नदी में फेंकने की कोशिश की.

एक पोप तो ऐसे भी हैं जिनका शव अभी भी सांता क्लाज़ की वेशभूषा में सेंट पीटर गिरजाघर में अभी भी रखा हुआ है.

खैर सबसे अंत में मेरी महिला गाईड ने पोप जॉन पॉल द्वितीय के बारे में बताया कि ये काफी सक्रिय पोप माने जाते हैं.

गर्भपात से लेकर समलैंगिकता और विवाह जैसे मुद्दों पर उनकी अलग राय है और राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखते हैं.

इतना ही नहीं वैटिकन की अंदरुनी राजनीति में भी जॉन पॉल द्वितीय का एकछत्र राज था.

मेरी उत्सुकता देखकर और यह जानते ही कि मैं बीबीसी के लिए काम करता हूं, मेरी गाइड ने मुझे एक आमंत्रण पत्र दिया.

आमंत्रण था आठ दिसंबर को ईसाईयों की एक सभा में शामिल होने का जिसे पोप सेंट पीटर गिरजाघर में संबोधित करने वाले थे.

मैं खुशी खुशी आमंत्रण लेकर लौटा और सोचा कि इस बार तो पोप को देख सकूंगा. मैं देखना चाहता था एक अरब से अधिक लोगों के इस विश्वास स्तंभ को लेकिन दूसरे दिन ऐसा हो न सका.

इससे पहले 1999 में दिल्ली के प्रगति मैदान के पास पोप के काफिले का पीछा करते हुए दूर तक गया था लेकिन पोप की पीठ ही देख पाया था.

दूसरे दिन यानी आठ दिसंबर 2004 को मुझे वैटिकन पहुंचने में थोड़ी देर हो गई और मैं अंदर नहीं जा सका. मुझे बाहर लगे टीवी स्क्रीनों पर पोप को देखकर संतोष करना पडा.

लेकिन उस समय ये नहीं सोचा था कि अब इस सक्रिय पोप को फिर से देखने का मुझे कोई मौका नहीं मिलेगा.