शुक्रवार, 01 अप्रैल, 2005 को 16:12 GMT तक के समाचार
कैथोलिक धर्म में कार्डिनलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है. दुनिया भर में 184 कार्डिनल हैं जिनमें से पांच भारत के हैं.
नए पोप के चुनाव में इन पांचों कार्डिनलों में से तीन कार्डिनलों की की भूमिका होगी क्योंकि दो अन्य कार्डिनलों की उम्र 80 से अधिक है और नियमों के अनुसार 80 से अधिक उम्र वाले कार्डिनल वोट नहीं डाल सकते.
भारत के पांच कार्डिनल हैं मुंबई के कार्डिनल इवान डियास, एरनाकुलम के कार्डिनल वर्के विथयाथिल, रांची के कार्डिनल टेलिस्फोर टोप्पो, कार्डिनल दोरइस्वामी सिमॉन लोरदुसामी औकर कार्डिनल इग्नाशियस पिमेंटा.
कार्डिनल दोरइस्वामी और कार्डिनल पिमेंटा वोट नहीं दे सकेंगे.
कार्डिनल टेलिस्फोर टोप्पो
रांची के आर्चबिशप टेलीस्फोर टोप्पो 3 मई 1969 को पादरी बने थे. रांची के सेंट अल्बर्ट कॉलेज, सेंट जेवियर कॉलेज और रांची विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर चुके टोप्पो ने रोम के पोंटिफिकल उरबानियाना कॉलेज में भी पढ़ाई की है.
8 जून 1968 को वह दुमका के बिशप बने.
सेंट जोसफ हाई स्कूल में अध्यापन कर चुके टोप्पो आठ नवंबर 1984 को रांची के आर्चबिशप बनाए गए. इस समय टोप्पो कैथोलिक बिशप कांफ्रेस के अध्यक्ष भी हैं.
कार्डिनल इवान डियास
मुंबई के 69 वर्षीय कैथोलिक पादरी डियास 8 दिसंबर 1958 को पादरी बने थे. 21 फरवरी 2001 को कार्डिनल बने डियास ने वैटिकन के कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारिय़ां निभाई हैं.
1965 से 1973 तक डियास डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे, आइसलैंड, फिनलैंड, इंडोनेशिया, मैडागास्कर, में सेक्रेटरी ऑफ ननसिएचर्स भी रहे.
11 साल तक डियास ने वैटिकन के सोवियत संघ मामलों का प्रभार भी संभाला है.
इन सब ज़िम्मेदारियों के आधार पर कहा जा रहा है कि कार्डिनल डियास पोप पद के महत्वपूर्ण उम्मीदवार भी हो सकते हैं.
कार्डिनल वर्के विथयाथिल
सायरो मालाबार चर्च के कार्डिनल विथयाथिल 12 जून 1954 को पादरी बने थे. इसके बाद उन्होंने रोम में लंबी पढ़ाई की.
पढ़ाई पूरी करने के बाद बंगलौर के रिडेम्पटोरिस्ट सेमिनारी में 25 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया.
विथयाथिल कांफ्रेंस ऑफ रिलीज़नस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. 1996 में वो अकरिडा के बिशप चुने गए और 2001 में उन्हें कार्डिनल बनाया गया.
भारत में कुल एक करोड़ छह लाख कैथोलिक हैं जिनमें से 30 लाख से अधिक सायरो मालाबार चर्च में आते हैं.