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मंगलवार, 08 मार्च, 2005 को 01:37 GMT तक के समाचार

ग़रीबी और एड्स का चेहरा बनती महिलाएँ

आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं के लिए शिक्षा के अवसर बढ़े हैं.

लेकिन इसी समय दुनिया भर में ग़रीबी और एचआईवी संक्रमण ने पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ही अपना शिकार ज़्यादा बनाया है.

वहीँ क़ानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव अभी भी बड़ी समस्या है और उनके ख़िलाफ़ मानवाधिकार हनन के मामले भी बढ़े हैं.

आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हैं और इसी दिन से अगले एक वर्ष को दुनिया भर में लिंगभेद कम करके महिलाओं को ज़्यादा सुरक्षित भविष्य देने के वर्ष के रुप में मनाया जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यूनेस्को के महानिदेशक कोइशिरो मात्सूरा ने अपने संदेश में कहा है कि यह वर्ष दुनिया भर के लिए यह लक्ष्य तय करने का है कि वे प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में लड़कों और लड़कियों का भेद ख़त्म करेंगे.

उन्होंने कहा है कि यूनेस्को अपने सदस्य देशों को इस बारे में सहयोग दे रहा है कि वे अपने देशों में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा दें और विज्ञान, इंजीनियरिंग और टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में लड़कियों को आगे आने के अवसर उपलब्ध करवाएँ.

चिंता

उन्होंने कहा है, "अनुमान है कि इस समय एचआईवी-एड्स पीड़ितों में 50 प्रतिशत महिलाएँ हैं लेकिन उससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि 18 से 25 वर्ष की महिलाओं के बीच यह संक्रमण तेज़ी से बढ़ रहा है."

उन्होंने क़ानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा की घटनाओं और मानवाधिकार की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई है.

बोझ कम करना

वहीं संयुक्त राष्ट्र की एक और संस्था वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने इस वर्ष को महिलाओं पर बोझ कम करने को अपना लक्ष्य बनाया है.

इस संस्था का कहना है कि यदि भोजन पर महिलाओं का नियंत्रण रहे तो बच्चों का विकास बेहतर होता है.

लेकिन संस्था का कहना है कि पहले से ही महिलाओं पर घरेलू काम का बोझ बहुत अधिक है और ऐसे में खाद्य सामग्री पर उनको नियंत्रण देना उनका बोझ बढ़ाने जैसा ही होगा.

विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक जेम्स मॉरिस कहते हैं, "भोजन पर महिलाओं का नियंत्रण महत्वपूर्ण तो है लेकिन यह आवश्यक है कि हम महिलाओं पर लादे गए अतिरिक्त बोझ को कम करें."

इस संस्था ने भी एड्स पीड़ित महिलाओं के लिए चिंता जताई है.