शुक्रवार, 04 मार्च, 2005 को 17:51 GMT तक के समाचार
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से
किसी जमाने में ‘मिनी चीन’ कहा जाने वाला ‘चाइना टाउन’ अब संक्रमण के गहरे दौर से गुजर रहा है.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के पूर्वी छोर पर स्थित इस बस्ती में कभी हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी. लेकिन हाल के वर्षों में खासकर युवा लोगों के रोजगार की तलाश में पश्चिमी देशों में पलायन की प्रक्रिया तेज होने के कारण अब इसकी रौनक फीकी पड़ने लगी है.
अब बचे-खुचे लोग भी बेहतर मौके की तलाश में हैं. यह भारत व अपने मूल देश चीन के बारे में क्या सोचते हैं और किस तरह अपने वजूद को बचाने के लिए लड़ रहे हैं.
युवा ली की कहानी
एक चीनी युवा जॉन ली कहते हैं "अब तो इस मिनी चीन की रौनक लगभग उजड़ गई है. मेरे दादा साठ के दशक में यहां आए थे. तब मेरे पिताजी महज 16 साल के थे. पिताजी की शादी भी यहीं हुई. वे शादी के बाद एक बार चीन गए. लेकिन मैंने तो चीन को सिर्फ एटलस में ही देखा है."
ली के पिताजी और दादा जी पहले यहां चीन से आए दूसरे लोगों की तरह चमड़े की टैनरी खोली थी. तब इतनी प्रतिद्वंद्विता नहीं थी बाजार में. लेकिन लगभग दस साल पहले इस धंधे में पहले जैसी कमाई नहीं होने के कारण हमने टैनरी बंद कर उसी जगह एक रेस्तरां खोल लिया. इससे खासी कमाई हो जाती है.
ली के दो भाई कनाडा में बस गए हैं और अच्छा-खासा पैसा कमा रहे हैं. कई रिश्तेदार भी वहीं हैं.
वो कहते हैं " मैं खुद भी जाना चाहता हूं.लेकिन पिता जी वहां नहीं जाना चाहते. उनको इस उम्र में अकेला कैसे छोड़ सकता हूं. जहां तक चीन की संस्कृति का सवाल है, हम यहां उसे किसी तरह जिंदा रखे हुए हैं.बीते महीने हमने चीनी नववर्ष बनाया. लेकिन युवको के पलायन ने अब इसकी रौनक भी छीन ली है."
सन्नाटे का माहौल
इस चाइना टाउन के जो क्लब युवाओं से भरे रहते थे, वहां सन्नाटा पसरा है.
अब या तो उम्रदराज लोग यहां बच गए हैं या फिर बच्चे.बीच की पूरी पीढ़ी गायब हो रही है.
उदारीकरण व भूमंडलीकरण के इस दौर में चीनी अर्थव्यवस्था में भी काफी खुलापन आया है.
शायद यही सोचकर ली की इच्छा होती है चीन जाने की. जहां उनके दादा व पिता का जन्म हुआ था.
वो कहते हैं " जाने का मन करता है लेकिन सोचता हूं कि क्यों न उसी पैसे से किसी पश्चिमी देश का रुख करूं! मेरी तरह बाकी युवा भी इसी ऊहापोह में फंसे हैं. वे ने तो पूरी तरह चीनी बन पाए हैं और न ही भारतीय. वे लोग बांग्ला भी बोलते हैं और अंग्रेजी भी. लेकिन अपनी भाषा भूल गए हैं. "
ली और उनके जैसे युवाओं से बातचीत के बाद यही लगता है भारत में बसे चीनी मूल के लोग और समाज गंभीर संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है.