गुरुवार, 03 मार्च, 2005 को 12:54 GMT तक के समाचार
लेबनान में जारी संकट का असर मध्यपूर्व के कई देशों पर पड़ सकता है.
अमरीका की लेबनान नीति और लेबनान में जारी राजनीतिक बदलावों के कारण सीरिया और ईरान एक साथ खड़े नज़र आ रहे हैं.
अमरीका की मध्यपूर्व नीति में भी लेबनान का महत्वपूर्ण स्थान है, ख़ासतौर पर लोकतंत्र को लेकर. शायद ही कोई मानता हो कि बेरूत की सड़कों पर जारी राजनीतिक विरोध प्रदर्शन पूर्वी यूरोप के देशों में हो चुकी क्रांति की तरह किसी क्रांति का सूचक है.
लेकिन एक बात साफ़ है कि लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक हरीरी की हत्या के बाद से लेबनान में फैली नाराज़गी और अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के लिए स्थिति संभालना आसान नहीं होगा.
अमरीकी विदेश विभाग के एक मंत्री डेविड सैटरफ़ील्ड का कहना है, "मुझे लगता है कि लेबनान में सीरिया से, सीरिया की सेना से, उसके ख़ुफ़िया अधिकारियों से, लोगों की नाराज़गी बढ़ती जा रही है."
"लेबनान के लोग नहीं चाहते कि सीरिया लेबनान के राजनीतिक मामलों और उनकी रोज़मर्रा की ज़िदगी में दख़ल दे."
लेकिन राष्ट्रपति बशर अल असद के लिए भी लेबनान का ख़ासा महत्व है. मामला सिर्फ़ सीरिया को किसी संभावित इसराइली हमले से बचाने का नहीं है.
सीरिया के आर्थिक हित लेबनान से जुड़े हुए हैं. इतना ही नहीं, कई सीरियाई मानते हैं कि इतिहास की दृष्टि से लेबनान अलग देश है ही नहीं, वह सीरिया का हिस्सा है.
हाल ही में बढ़ते दबाव के कारण सीरिया ने अमरीका को इराक़ के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के सौतेले भाई को सौंप दिया.
अब उत्सुकता यही है कि सीरिया ने ऐसा करके अमरीका को कोई संकेत भेजने की कोशिश की है या वो ऐसा करके सद्दाम की बाथ पार्टी के प्रखर विरोधी रहे ईरान को खुश करने की कोशिश कर रहा है.