शनिवार, 05 फ़रवरी, 2005 को 20:53 GMT तक के समाचार
दुनिया के सात धनी देशों के संगठन जी-7 के वित्त मंत्रियों ने दुनिया के कुछ सबसे ग़रीब देशों का पूरा क़र्ज माफ़ करने की योजना का समर्थन किया है.
ग़ौरतलब है कि इन देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक लंदन में हो रही है.
ब्रिटेन के वित्त मंत्री गोर्डन ब्राउन ने कहा कि इस सम्मेलन को '100 प्रतिशत क़र्ज़ राहत सम्मेलन' के रूप में याद किया जाएगा.
ब्राउन ने कहा कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष इस मामले में विभिन्न देशों का अध्ययन करेंगे और इस क़दम से क़रीब 37 देशों को फ़ायदा हो सकता है.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इस बैठक में ब्रिटेन के इस प्रस्ताव पर प्रगति तो हुई है लेकिन अभी लंबा रास्ता तय किया जाना है.
ब्राउन ने कहा, "हम ग़रीब देशों का क़र्ज़ माफ़ करने की इस योजना के बिल्कुल शुरूआती स्तर पर हो सकते हैं जिसमें ऐसा क़र्ज़ माफ़ किया जाएगा जिसकी वास्तविकता में अदायगी संभव ना हो."
ब्राउन ने कहा, "धनी देश ग़रीब देशों की आवाज़ सुन रहे हैं." लेकिन उन्होंने कहा कि इस मामले में ग़रीब देशों की सरकारों पर सुधार, भ्रष्टाचार उन्मूलन और पारदर्शिता के लिए दबाव डाला जाएगा.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सिद्धांत रूप में तो सहमति हो गई है लेकिन विश्व संगठनों को अब यह देखना होगा कि इस पर अमल किस तरह होगा.
एक ग़ैरसरकारी संगठन ऑक्सफ़ैम के वरिष्ठ नीति सलाहकार मैक्स लॉसन ने इस बयान का स्वागत करते हुए कहा कि 'जी-7 के मंत्री 2005 की पहली बाधा' पार कर चुके हैं.
लेकिन मैक्स लॉसन का कहना था, "धनी देशों को इस पर तेज़ी से अमल करना होगा. इस बैठक और अगली बैठक के बीच की अवधि में ग़रीब देशों में बीस लाख बच्चे बेवजह मारे जाएंगे."
उन्होंने कहा कि अगर धनी देश ग़रीब देशों की मदद करना चाहते हैं तो इसमें रफ़्तार से काम करें.
संगठन
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अप्रैल में बैठक होगी और इसे इस प्रस्ताव पर ग़ौर करना है कि क़र्ज़ राहत में यह अपना स्वर्ण भंडार इस्तेमाल करे.
गोर्डन ब्राउन ने कहा कि जी-67 देशों के मंत्री सूनामी से प्रभावित कुछ देशों पर क़र्ज का सूद और क़र्ज़ अदायगी साल 2005 के अंत तक स्थगित करने के लिए राज़ी हो गए हैं लेकिन विकासशील देशों पर क़र्ज़ के बोझ में राहत देने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सुविधा बनाने की ब्रिटेन की योजना पर सहमति नहीं हो सकी है.
ब्राउन इस योजना के तहत क़रीब दस अरब डॉलर प्रति वर्ष के हिसाब से दस साल तक धन मुहैया कराना चाहते थे और इस योजना पर जी-7 देशों का समर्थन चाहते थे.