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गुरुवार, 06 जनवरी, 2005 को 00:22 GMT तक के समाचार

मीडिया की भूमिका और कुछ सवाल

हिंद महासागर में 26 दिसंबर को आए समुद्री भूकंप और उसके बाद उठी भयंकर सूनामी लहरों से हुई तबाही में मदद के लिए जो इतनी बड़ी सहायता राशि एकत्र हुई है उसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि मीडिया ने इस हादसे को बहुत प्रमुखता से जगह दी है.

इंटरनेट में भी इसमें अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, ख़ासतौर से लोगों की दुखभरी कहानियाँ दुनिया भर में पहुँचाने, वीडियो और फ़ोटो के ज़रिए तबाही दिखाने से बाक़ी दुनिया में लोगों की हमदर्दी जागी और लोग सहायता राशि देने के लिए उमड़ पड़े.

इतना ही नहीं, इंटरनेट ने सहायता राशि एकत्र करने के मुश्किल काम को आसान और तीव्र बना दिया यानी सिर्फ़ कुछ ही दिनों में सहायता राशि का ढेर लग गया.

बीबीसी के मीडिया मामलों के संवाददाता सेबस्टेन अशर का कहना है कि प्रमुख टेलीविज़न समाचार चैनलों ने ग़ैर युद्ध काल के इस सबसे बड़े हादसे की कवरेज के लिए महत्वाकांक्षी अभियान चलाए हैं.

बीबीसी, सीएनएन वग़ैरा जैसे चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने भारी पैमाने पर सूनामी की कवरेज दिखाई है जिसके लिए भारी संख्या में पत्रकार विभिन्न स्थानों पर लगाए.

लेकिन यहाँ सवाल ये भी उठे हैं कि जिस तरह से भयावह दृश्य मीडिया में दिखाए गए क्या उन्हें दिखाया जाना चाहिए था क्योंकि इससे बाक़ी लोगों को दिलो-दिमाग़ पर गहरा असर पड़ता है.

एशियाई देशों के कुछ मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि तबाही और मृतकों की तस्वीरें और कवरेज दिखाने से यह ज़ाहिर होता है कि पश्चिमी मीडिया सूनामी के प्रभावितों के लिए क़तई भी संवेदनशील नहीं हैं.

उधर मीडिया संगठनों का कहना है कि सिर्फ़ एक यही तरीक़ा था जिसके ज़रिए इस प्राकृतिक आपदा की भयावहता को लोगों तक पहुँचाया जा सके.

बहरहाल इन विवादों के बीच कुछ समाचार संगठनों ने सहायता राशि एकत्र करने के प्रयासों को और तेज़ करने का फ़ैसला किया है.