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रविवार, 19 दिसंबर, 2004 को 00:24 GMT तक के समाचार

डारफ़ुर में शांति की कोशिशों को धक्का

अफ़्रीकी संघ ने कहा है कि सूडान सरकार ने देश के डारफ़ुर क्षेत्र में तय समयसीमा के बावजूद संघर्षविराम का पालन नहीं किया है और वहाँ अभी भी लड़ाई जारी है.

अफ्रीकी संघ ने सूडान सरकार को शनिवार शाम 6 बजे तक संघर्ष विराम लागू करने और अपनी सेना को पीछे हटाने की समयसीमा दी थी.

लेकिन 24 घंटे के बाद संघर्ष विराम आयोग के अध्यक्ष जनरल फेस्टस ओकोंक्वो ने नाइजीरिया की राजधानी अबूजा में मध्यस्थों और अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को बताया कि दारफ़ुर में लड़ाई अब भी जारी है.

अफ्रीकी संघ के प्रवक्ता अस्साने बा ने बीबीसी से कहा,"सूडानी सरकार के हेलीकॉप्टर दारफ़ुर के लबादो इलाक़े में अब भी हमले कर रहे हैं".

धक्का

इस ख़बर से अबूजा में होने वाली शांतिवार्ताओं को और धक्का लगेगा.

ये शांतिवार्ताएं एक सप्ताह पहले फिर से शुरू हुई थीं लेकिन विद्रोहियों ने इनका बहिष्कार कर दिया था.

विद्रोहियों ने कहा था कि जब तक सरकार हमले बंद नहीं करती तब तक वे शांति वार्ताओं में हिस्सा नहीं लेंगे.

सूडान के विदेशसंबंध मंत्री मुस्तफ़ा उस्मान इस्माइल ने कहा,"सूडानी सैनिकों को किसी नए इलाक़े में तब तक कोई हमला नहीं करना चाहिए जब तक कि उन पर हमला न हो."

अफ्रीकी संघ के संघर्ष विराम का निर्देश सरकार और विद्रोहियों, दोनों के लिए था.

सरकार की ओर से लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया करते हुए जस्टिस ऐंड ईक्वालिटी मूवमेंट के फ़ील्ड कमांडर उमर आदम ने कहा कि वे तो पहले से ही संघर्ष विराम का पालन कर रहे हैं.

उन्होंने कहा,"हम संघर्ष विराम का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं, हम सभी समझौतों का सम्मान करते हैं इसलिए कोई भी समयसीमा सरकार के लिए होनी चाहिए, हमारे लिए नहीं."

अबूजा में चल रही वार्ताओं में भाग ले रहे प्रतिनिधियों के साथ रविवार को मध्यस्थों की भेंट होगी.

वहाँ ये विचार किया जायेगा कि अगला क़दम क्या हो.

डारफ़ुर संकट

डारफ़ुर में फ़रवरी 2003 में संकट शुरू हुआ जब विद्रोहियों ने सरकारी ठिकानों पर ये कहते हुए हमला शुरू कर दिया कि सरकार उनकी अनदेखी कर रही है.

इसके बाद वहाँ सरकार समर्थक मिलिशिया गुट जंजीवाद ने स्थानीय काले अफ़्रीका निवासियों पर हमले शुरू कर दिए.

बताया जा रहा है कि तब से लेकर लगभग 70,000 लोग मारे जा चुके हैं.

लगभग 15 लाख लोगों को अपने घरों से भागना भी पड़ा है.

इसे दुनिया का सबसे गंभीर मानवीय संकट का नाम भी दिया गया है.