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गुरुवार, 18 नवंबर, 2004 को 04:59 GMT तक के समाचार

सूडान के संकट पर महत्वपूर्ण बैठक

कीनिया की राजधानी नैरोबी में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है जिसमें सूडान में जारी संकट से निपटने के लिए हो रही है.

चौदह सालों में पहली बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक न्यूयॉर्क से बाहर हो रही है.

सुरक्षा परिषद के राजदूत सूडान की रूकी हुई शांति प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने की कोशिश करेंगे.

दो दिनों तक चलने वाली इस बैठक में देश के दक्षिणी हिस्से में शांति स्थापित करने की कोशिश पर चर्चा होगी.

विचार-विमर्श

बीबीसी की संयुक्त राष्ट्र संवाददाता सुजाना प्राइस का कहना है कि बैठक में हिंसा से प्रभावित दारफ़ुर इलाक़े से निपटने के बारे में भी विचार-विमर्श होगा.

सहायता एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों ने दारफ़ुर में हिंसा रोकने के लिए कड़े प्रतिबंध लगाने की अपील की है.

यह सिर्फ़ चौथा मौक़ा है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक न्यूयॉर्क से बाहर हो रही है.

सूडान की सरकार और देश के दक्षिणी हिस्से में सक्रिय विद्रोहियों के बीच 21 सालों से चल रहे गृह युद्ध को ख़त्म कराने के लिए पिछले दो सालों से बातचीत चल रही है.

मंगलवार को अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सूडान के राष्ट्रपति उमर अल बशीर और विद्रोहियों के नेता जॉन गरांग को फ़ोन करके शांति प्रक्रिया में अपना सहयोग देने की पेशकश की थी.

महत्वपूर्ण क़दम

संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत जॉन डैनफ़ोर्थ ने कहा कि वे सूडान की शांति प्रक्रिया के बारे में 'आशावादी' शब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

उन्होंने कहा कि नैरोबी में आकर बैठक करना अपने आप में एक महत्वपूर्ण क़दम है जो यह साबित करता है कि सुरक्षा परिषद की ओर से हरसंभव प्रयास हो रहा है.

कुछ महीने पहले ऐसा लग रहा था कि सरकार और दक्षिणी विद्रोही सत्ता में भागीदारी को लेकर किसी समझौते के क़रीब पहुँच रहे हैं.

लेकिन दारफ़ुर संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी ध्यान दूसरी ओर बँट गया.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि दारफ़ुर मामले पर प्रस्ताव को लेकर सुरक्षा परिषद के कुछ सदस्य बँटे हुए हैं. चीन जैसे सदस्य का कहना है कि वह सूडान पर ज़्यादा दबाव डालने के पक्ष में नहीं है.

सुरक्षा परिषद का मानना है कि कोई भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास होना चाहिए. वैसे सुरक्षा परिषद ने सूडान पर प्रतिबंध लगाने की धमकी वाले दो प्रस्ताव पहले भी पारित किए हैं.

लेकिन सहायता एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि हिंसा रोकने की दिशा में इस प्रस्ताव का कोई भी असर नहीं पड़ा है.