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गुरुवार, 26 अगस्त, 2004 को 10:17 GMT तक के समाचार

इराक़ में सबसे बड़े शिया नेता सिस्तानी

आयतुल्ला अली सिस्तानी इराक़ में शिया समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं.

इराक़ में अभी पाँच वरिष्ठ आयतुल्ला हैं और सिस्तानी उनमें सबसे वरिष्ठ हैं.

इराक़ में सद्दाम हुसैन की पिछली सरकार के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे.

उन्हें लंबे समय तक नज़रबंद रहना पड़ा मगर कुल-मिलाकर वे राजनीति से दूर ही रहे.

मगर उनकी राजनीति से दूर रहने की ये नीति अन्य शिया नेताओं को बहुत रास नहीं आई जिनमें मुक़्तदा अल सद्र भी एक हैं.

सत्ता संघर्ष

इस वर्ष अप्रैल में सद्दाम हुसैन की सत्ता के पतन के बाद सद्र समर्थकों ने सिस्तानी के घर पर क़ब्ज़ा कर लिया.

उन्होंने सिस्तानी से कहा कि वे देश छोड़ दें औऱ मुक़्तदा सद्र को नया नेता मान लें.

इस घटना के बाद सिस्तानी भूमिगत हो गए मगर रहे इराक़ में ही.

दरअसल सद्दाम हुसैन की सत्ता के गिरने के बाद से ही शिया समुदाय में नेतृत्व की लड़ाई शुरू हो चुकी है.

इस दौरान 1980 के दशक के समय के एक आयतुल्ला के बेटे की हत्या भी कर दी गई.

अब्दुल माजिद अल खोइ लंदन में निर्वासन का जीवन बिता रहे थे और इराक़ लौटते ही छुरा घोंपकर उन्हें मार डाला गया.

सिस्तानी इराक़ में पुरानी पीढ़ी वाले रूढ़िवादी शिया नेताओं के प्रतिनिधि माने जाते हैं.

अमरीकी गठबंधन से संबंध

सिस्तानी के प्रभाव को अमरीकी गठबंधन समझता है और इसीलिए उसने उनकी उदार नीतियों की सराहना की है.

सिस्तानी धर्म को शासन से अलग रखना चाहते हैं और राजनीतिक बयान देने से बचते रहे हैं.

उन्होंने इसके पहले भी कई बार अपने समर्थकों से गठबंधन सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं करने की अपील की है.

मगर पिछले वर्ष अक्तूबर-नवंबर में उन्होंने इराक़ के बारे में अमरीका की नीति की जमकर खिंचाई की थी.

उन्होंने अमरीका की पहल पर इराक़ी शासकीय परिषद के बनाए जाने की योजना को ठुकरा दिया.

उन्होंने ये कहते हुए योजना का विरोध किया कि इराक़ के भविष्य को तय करने में इराक़ियों को समुचित भागीदारी नहीं दी जा रही.

महत्वपूर्ण भूमिका

इस वर्ष जनवरी में सिस्तानी के हज़ारों समर्थकों ने इराक़ में चुनाव करवाने के लिए रैली निकाली.

उन्होंने इस वर्ष मार्च में इराक़ी शासकीय परिषद की ओर से घोषित नए संविधान का भी विरोध किया.

इस साल अप्रैल में मुक़्तदा अल सद्र की मेहदी सेना के समर्थकों ने जब अमरीकी सैनिकों के विरूद्ध हथियार उठा लिए तो सारा ध्यान सिस्तानी से हटकर मुक़्तदा सद्र की ओर चला गया.

अब आयतुल्ला सिस्तानी इराक़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि उनके रूख़ से शिया आबादी ये निर्णय कर पाएगी कि एक जून को इराक़ में सत्ता में आई अंतरिम सरकार को स्वीकार किया जाए या नहीं.