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गुरुवार, 05 अगस्त, 2004 को 07:20 GMT तक के समाचार

ग्वांतानामो के बंदियों ने किया विरोध

क्यूबा में अमरीकी नौसैनिक अड्डे ग्वांतनामो बे में रखे गए बंदियों में से पाँच ने अमरीकी सैन्य ट्राइब्यूनलों की सुनवाई में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष जून में फ़ैसला सुनाया था कि ग्वांतनामो बे शिविर के क़ैदी अपने बंदीकरण को अमरीकी अदालतों में ही चुनौती दे सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने ग्वांतनामो बे शिविर के बंदियों के मामलों की समीक्षा विशेष सैन्य न्यायाधिकरणों से कराने की घोषणा की थी.

इस व्यवस्था के तहत एक बंदी के मामले की समीक्षा तीन सैन्य अधिकारियों वाले एक न्यायाधिकरण ने पिछले महीने के आख़िर में शुरू भी कर दी थी.

लेकिन बंदियों को क़ानूनी सहायता या वकील नियुक्त करने का अधिकार नहीं दिया गया और वे सिर्फ़ सैनिक वकील से ही अपनी बात कह सकते थे.

सैन्य ट्राइब्यूनलों की सुनवाई में अब तक आठ लोगों के मामलों की समीक्षा की गई है और इस समीक्षा का हिस्सा बनने से इनकार करने वाले पाँच लोग भी इन्हीं में से हैं.

इन आठ लोगों में एक अल्जीरियाई, तीन यमन, एक मोरक्को और एक सऊदी अरब के नागरिक भी हैं.

ट्राइब्यूनल की सिफ़ारिशों के बारे में अभी पता नहीं चला है.

बंदियों के मामलों की समीक्षा के बाद ट्राइब्यूनल को यह तय करना है कि उन्हें दुश्मन के लड़ाके मानकर बंदी बनाए रखा जाए या आज़ाद कर दिया जाए.

अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए सभी क़रीब 600 बंदियों के मामलो की इसी तरह से सैन्य ट्राइब्यूनल में समीक्षा की जाएगी और उन्हें बंदी बनाए रखने या आज़ाद करने के बारे में फ़ैसला किया जाएगा.

'अमरीकियों को मारो'

इन बंदियों को जब सैन्य ट्राइब्यूनल के सामने पेशी के लिए तलब किया गया तो उन्होंने पेश होने से इनकार कर दिया. इनमें सऊदी अरब, मोरक्को और यमन के बंदी शामिल थे.

अमरीकी रक्षा प्रवक्ता कमांडर बेसी ब्रेंटन ने बताया कि उन बंदियों ने "ऐतिहासिक रूप से असहयोग" किया.

"वे ट्राइब्यूनल के सामने थे लेकिन उन्होंने जाँचकर्ताओं के साथ सहयोग नहीं किया."

प्रवक्ता ने बताया कि उनके इनकार के बावजूद उन हालात और सबूतों पर विचार किया गया जिनमें उन लोगों को बंदी बनाया गया था.

प्रवक्ता के अनुसार इनकार करने वाला पहला बंदी 24 वर्षीय एक अल्जीरियाई है जिसने कहा, "अगर उसे रिहा कर दिया जाता है तो वह अमरीकियों को मारेगा."

ग्वांतनामो बे में मौजूद बीबीसी संवाददाता निक चाइल्ड्स का कहना है कि बंदी अगर इस तरह से इनकार करते रहे तो अमरीकी सेना की इस दलील पर सवाल उठ सकते हैं कि सैन्य ट्राइब्यूनल की समीक्षा एक वैध प्रक्रिया है.

हालाँकि इस समीक्षा की निगरानी करने वाले एक वरिष्ठ नौसैनिक अधिकारी गोर्डन इंगलैंड ने कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष है और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार ही है.

"युद्ध बंदियों का दर्जा जेनेवा समझौते के अनुच्छेद पाँच के तहत निर्धारित किया जाता है."

उन्होंने कहा, "ये बंदी युद्ध क़ैदी नहीं हैं. ये उन देशों का हिस्सा नहीं हैं जिन्होंने अमरीका के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान किया. ये जेनेवा समझौते का पालन नहीं करते हैं, दरअसल ये उसका उल्टा करते हैं जो जेनेवा समझौते में करने को कहा गया है."

आलोचना

मानवाधिकार संगठनों ने इन सैन्य ट्राइब्यूनलों की आलोचना की है क्योंकि इन बंदियों को बुश प्रशासन दुश्मन के लड़ाके मानता है और उन्हें क़ानूनी प्रतिनिधित्व से भी वंचित किया गया है.

पहली बार गुरूवार को कुछ पत्रकारों को कुछ शर्तों के साथ इस ट्राइब्यूनल की सुनवाई में उपस्थित रहने की इजाज़त दी जाएगी.

अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि जिन बंदियों के मामलों की अभी तक समीक्षा की गई है उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान नमें सैन्य प्रशिक्षण लिया और किसी न किसी रूप में तालेबान और अल क़ायदा से उनके संबंध रहे हैं.

यह भी कहा गया है कि बहुत से बंदियों ने अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई में भी हिस्सा लिया.