शुक्रवार, 23 जुलाई, 2004 को 08:03 GMT तक के समाचार
सलीम रिज़वी
न्यूयॉर्क से
अमरीका में 11 सितंबर 2001 को हुए हमले की जाँच रिपोर्ट का सभी लोग बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. लोगों को इंतज़ार इस बात का था कि आयोग हमलों को न रोक पाने के लिए किसी की ज़िम्मेदारी तय करेगा.
लोग ये भी जानना चाहते थे कि अब क्या देश में सुरक्षा के हालात बेहतर हुए हैं जिससे ऐसे हमले फिर न हों. ख़ासतौर से दक्षिण एशियाई समुदाय के लोग चाहते हैं कि रिपोर्ट की सिफ़ारिशें जितना जल्दी लागू हों, उतना ही अच्छा होगा.
11 सितंबर 2001 को हुए उस हमले में दक्षिण एशियाई मूल के 200 से भी ज़्यादा लोग मारे गए थे और उनमें 35 भारतीय थे.
पाकिस्तानी मूल के अहमद शेरवानी के दोस्त का बेटा उस हादसे में मारा गया था.
अहमद शेरवानी कहते हैं, "वह बहुत ही तेज़-तर्रार बच्चा था. उसने पुलिस अकादमी में भी प्रशिक्षण लिया था. हादसे के बाद उस पूरे ख़ानदान पर जो भी गुज़री वो तो हम ही जानते हैं."
आयोग की रिपोर्ट में जिन बातों को हमलों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है उससे और आयोग की सिफ़ारिशों से लोगों को ये लगा है कि अब तीन साल बाद कुछ ठोस हुआ है मगर इसमें जितना समय लगा उससे लोग कुछ मायूस और नाराज़ से नज़र आए.
भारतीय मूल के सजीश कहते हैं, "तीन साल तो बहुत ज़्यादा समय ले लिया गया. इस मामले में तो जल्दी करनी चाहिए थी. एक साल में रिपोर्ट आ जाती तो इस तरह के हमलों को रोकने के कुछ ज़्यादा क़दम उठाए जा सकते थे."
जल्दी
अहमद शेरवानी भी यही मानते हैं कि फ़ौरन ही आयोग बिठाना चाहिए था और एक साल में ही रिपोर्ट आ जानी चाहिए थी.
मगर इस रिपोर्ट से लोगों को क्या कुछ राहत मिलेगी?
न्यूयॉर्क में एक वकील ख़ालिद आज़म कहते हैं कि रिपोर्ट आने के बाद भी उस हादसे के लोगों के ग़म कम नहीं होंगे.
उनके अनुसार, "ज़ाहिर है जिनके रिश्तेदार इस हादसे में मारे गए हैं उन्हें बड़ा सदमा पहुँचा है कि उनकी सरकार उनकी जान माल की हिफ़ाज़त करने में नाकाम रही."
अब जबकि रिपोर्ट आ गई है, लोगों की माँग है कि सिफ़ारिशें जल्दी ही लागू कर देनी चाहिए.
भारतीय मूल के शाश्वत का कहना है कि अब सरकार जल्दी ही रिपोर्ट लागू कर दे. उन्होंने कहा, "हम सरकार से ये विनती भर ही करते हैं कि अब वो जल्दी ऐसे क़दम उठाए जिससे और किसी को इस तरह के हमलों में अपने चाहने वालों की मौत का सदमा नहीं उठाना पड़े."
कुछ लोग अब भी ये सवाल करते नज़र आ रहे हैं कि इन हमलों को रोकने में किसी अधिकारी या नेता को नाकाम रहने का दोषी नहीं ठहराया गया है.
इसके अलावा हमलों का डर तो अब भी बना हुआ है इसलिए लोग अब भी सुरक्षा के इंतज़ामों को समुचित नहीं मान रहे हैं.
अब लोगों को ये लग रहा है कि नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की भागदौड़ में कहीं ये रिपोर्ट धरी की धरी न रह जाए.