गुरुवार, 08 जुलाई, 2004 को 22:29 GMT तक के समाचार
ऑस्ट्रेलिया भी उन देशों में शामिल हो गया है जो अमरीका के मिसाइल प्रतिरक्षा कवच कार्यक्रम में उसका साथ दे रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया ने अमरीका के विवादास्पद मिसाइल प्रतिरक्षा कवच कार्यक्रम में शामिल होने के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये हैं.
सितम्बर 2001 में अमरीका पर हुए हमलों के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इस परियोजना को प्राथमिकता देने का फ़ैसला किया था, लेकिन इस पर आने वाले ख़र्च और व्यवहारिकता पर सवाल उठते रहे हैं.
फिर भी ब्रिटन, इसराइल, जापान और दक्षिण कोरिया इस योजना में शामिल हो चुके हैं.
ऑस्ट्रेलिया के प्रतिरक्षा मंत्री रॉबर्ट ने कहा कि सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो भविष्य की सुरक्षा मांगो पर भी नज़र रखे.
बचाव
उन्होंने कहा, "हमारी ज़िम्मेदारी केवल आज के ख़तरों पर नज़र रखना ही नहीं है बल्कि उन ख़तरों से भी बचाव करना है जो भविष्य में आ सकते हैं."
प्रतिरक्षा मंत्री रॉबर्ट "आधुनिक टेक्नॉलॉजी से ये संभव है कि आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से सेना और एक व्यापक क्षेत्र को बचाया जा सके. हम समझते हैं कि इस नई तकनॉलॉजी में निवेश करना ऑस्ट्रेलिया के लिये फ़ाएदेमंद साबित होगा."
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने इस साल के शुरु में कहा था कि अगर ऑस्ट्रेलिया इस योजना में शामिल नहीं होता तो इसे बहुत ग़ैरज़िम्मेदाराना समझा जायेगा.
अभी मिसाइल प्रतिरक्षा कवच कार्यक्रम विकसित किया जा रहा है, लेकिन जब ये तैयार हो जाएगा तो अपने अति आधुनिक राडार सिस्टम के ज़रिए आने वाली मिसाइलों को समय रहते ढूंढ कर नष्ट कर सकेगा.
महत्वाकांक्षी योजना
अमरीकी प्रतिरक्षा विभाग चाहता है कि वह समुद्र स्थित इन्टरसैप्टर विकसित करे, विमानों में लेज़र लगाए और अन्तरिक्ष से रॉकेट दाग़ सके.
मिसाइल प्रतिरक्षा कवच का एक हिस्सा इस साल के अन्त तक अलास्का में लगा दिया जाएगा. अनुमान है कि ये इस कार्यक्रम में अगले पाँच वर्षों में पचास अरब डॉलर का ख़र्च आएगा.
ये एक महत्वाकांक्षी योजना है लेकिन सभी इससे ख़ुश नहीं हैं.
ऑस्ट्रेलिया के विपक्षी दलों का कहना है कि इस कवच के विकास से एशिया प्रशान्त क्षेत्र में अस्थायित्व बढ़ेगा.
इंडोनेशिया भी इसपर चिन्ता जताता रहा है. उसका कहना है कि बातचीत और कूटनीति अधिक कारगर हथियार हैं.