मंगलवार, 08 जून, 2004 को 04:43 GMT तक के समाचार
ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग लंबी उम्र जीते हैं तो कुछ छोटी उम्र में ही इस दुनिया को अलविदा कह जाते हैं.
कभी जानने की कोशिश की है आपने?
एक मोटा सा जवाब ये हो सकता है कि जिन लोगों को अच्छा खाना-पीना मिलता है और जिन्हें अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया हैं, उन्हें लंबी उम्र जीने में आसानी होती है.
सिर्फ़ इसे ही एक सिद्दांत मानें तो ग़रीब लोगों की उम्र तो बहुत छोटी होनी चाहिए, जबकि ऐसा नहीं होता है और ग़रीब लोग भी पचास-साठ और कुछ मामलों में सत्तर साल की उम्र तक आसानी से जी लेते हैं.
कुछ वैज्ञानिकों को इस सवाल ने कुछ अलग तरीक़े से मथा और उन्होंने इस पहेली को समझने में काफ़ी माथा-पच्ची के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले हैं.
ये निष्कर्ष पहली नज़र में काफ़ी दिलचस्प तो हैं लेकिन कुछ अवास्तविक भी लगते हैं.
कहावत है कि जितना गुड़ डाला जाए उतना ही मीठा होता है. इन वैज्ञानिकों के तर्क को मानें तो नतीजा निकलता है कि जो आदमी जितना ज़्यादा पढ़ा-लिखा होता है उसकी उम्र उतनी ही ज़्यादा होती है.
मसलन एक बीए या बीएससी किए हुए व्यक्ति से उस व्यक्ति की उम्र ज़्यादा होगी जिसने एमए या एमएससी किया हुआ हो.
इसी तरह पीएचडी किए हुए व्यक्ति की उम्र एमए किए हुए व्यक्ति से ज़्यादा होगी.
लंबा शोध
यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के एक प्रोफ़ेसर सर माइकल मैरमट ने एक किताब लिखी है जिसमें कुछ इसी तरह के दिलचस्प लेकिन शोध पर आधारित निष्कर्ष पेश किए गए हैं.
सर माइकल मैरमट पिछले क़रीब तीन दशक से जीवन संभावनाओं पर शोध कर रहे हैं और 1960 में उन्होंने लंदन में सिविल सेवा के अधिकारियों के स्वास्थ्य और जीवन पर जो शोध किया था वह काफ़ी प्रामाणिक माना जाता है.
उस शोध में निष्कर्ष निकाला गया था कि सिविल सेवा में जो अधिकारी जितने ऊँचे ओहदे पर होता है उसका स्वास्थ्य भी उतना ही बेहतर होता है जिससे लंबी उम्र तय होती है.
एक अन्य दिलचस्प निष्कर्ष निकाला गया है कि जिन अभिनेता-अभिनेत्रियों को ऑस्कर पुरस्कार मिला वे उनसे कुछ ज़्यादा साल जिए जो इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामांकित तो हुए लेकिन इसे प्राप्त नहीं कर सके.
'स्टेटस सिंड्रोम'
सर माइकल मैरमट का मानना है कि व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य इस तथ्य से प्रभावित होता है कि समाज में उसकी क्या हैसियत है.
सर माइकल ने इस प्रवृत्ति को 'स्टेटस सिंड्रोम' यानी 'प्रतिष्ठा प्रतीक' का नाम दिया है.
वह कहते हैं, "सबूतों से तो यही ज़ाहिर होता है कि सामाजिक प्रतिष्ठा से स्वास्थ्य अच्छा रहता है. लोग यही समझते हैं कि अच्छा खाना-पीना, धूम्रपान और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ उम्र तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं."
"इसमें कोई शक नहीं कि इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन शोध और सबूतों से तो यही पता चलता है कि यह पूरी कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा भर हैं."
सर माइकल मैरमट कहते हैं कि किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तय करने में दो चीज़ें मुख्य रूप से काम करती हैं कि हमारी अपनी ज़िंदगी पर हमारा कितना नियंत्रण है और समाज में हमारी क्या भूमिका है.
सर माइकल के मुताबिक़ धन से अच्छा स्वास्थ्य नहीं ख़रीदा जा सकता इसलिए व्यक्ति की आमदनी की भी कोई ख़ास भूमिका नहीं होती.
सर माइकल के इन निष्कर्षों को इस तथ्य से और बल मिलता है कि ग्रीस और माल्टा जैसे छोटे और तुलनात्मक रूप से ग़रीब देशों के लोग क्यों अमरीका और ब्रिटेन के लोगों से ज़्यादा उम्र तक जीते हैं.
सर माइकल मैरमट का कहना है कि अगर लोगों को अपने जीवन पर ज़्यादा नियंत्रण दिया जाए तो उनकी उम्र बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है.
इसी सिलसिले में वह सुझाव देते हैं कि बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा सुनिश्चित की जाए, कामकाजी लोगों को अपने जीवन पर ज़्यादा नियंत्रण मिले और अन्य लोगों को भी महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए.
उनका कहना है कि तमाम देशों को जापान से सबक लेना चाहिए जहाँ औसत आयु सारे देशों से ज़्यादा है.
एक आम जापानी औसतन 81.3 साल की उम्र तक जीने की अपेक्षा कर सकता है जबकि ब्रिटेन में औसत आयु 77.9 साल और अमरीका में 76.9 साल है.
भारत
भारत में औसत आयु 60 से 61 वर्ष के बीच है और 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की संख्या सिर्फ़ चार प्रतिशत के आसपास है.
जबकि दुनिया में औसत आयु 66 साल है और 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की संख्या क़रीब सात प्रतिशत है.
जापान में 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की संख्या किसी भी अन्य देश से ज़्यादा यानी क़रीब 17 प्रतिशत है.
यानी एक आम जापानी एक आम भारतीय से क़रीब तीन गुना लंबा जीवन जीता है.
जापान में दरअसल अपराध बहुत कम होते हैं और वहाँ की जेलों में क़ैदियों की संख्या भी बहुत कम है.
सर माइकल कहते हैं कि इस वजह से भी वहाँ सामाजिक तानाबाना काफ़ी स्वस्थ है जिससे लोग ज़्यादा उम्र तक जीते हैं.