वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित नई तस्वीरों में एक तस्वीर है एक निर्वस्त्र क़ैदी की जिसके गले में पट्टा बाँध कर घसीटा जा रहा है.
एक अन्य तस्वीर में एक लाश के पास एक अमरीकी सैनिक उंगलियाँ उठाकर जीत का निशान बना रहा है.
अख़बार का कहना है कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ तस्वीरों को पूर्व नियोजित तरीक़े से खींचा गया हो, लेकिन रिपोर्टर क्रिश्चियन डेवेनपोर्ट का कहना है कि तस्वीरें सच्ची हैं.
उन्होंने कहा कि ये तस्वीरें 2003 के मध्य में ली गईं थीं. अख़बार का निष्कर्ष यह है कि क़ैदियों की ये तस्वीरें इस बात का सबूत हैं कि अबू ग़रेब जेल में क्या हालात हैं.
इन तस्वीरों के सामने आने के बाद क़ैदियों के साथ किए जा रहे अमरीकी व्यवहार पर फिर से ध्यान जाता है. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि इस तरह का बर्ताव ग्वंतानामो बे से लेकर अफ़ग़ानिस्तान और अब इराक़ तक में जारी है.
बीबीसी के रक्षा संवाददाता जोनाथन मार्कस लिखते हैं कि साफ़ तौर पर अमरीकी जेल प्रणाली में काफ़ी ख़ामियाँ हैं.
कई मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी के बावजूद इराक़ में क़ैदियों के साथ इस तरह के अमानवीय बर्ताव की तस्वीरें सामने आईं हैं. ग्वांतानामो बे के बंधकों के बारे में क़ानूनी कार्यवाही अधर में अटकी हुई है.
बुश प्रशासन हमेशा सफ़ाई में यह कहता रहा है कि आंतकवाद के ख़िलाफ़ उनके अभियान में विशेष तरीकों की ज़रूरत है.
![]() ब्रितानी अख़बारों ने भी अबू ग़रेब प्रकरण पर विस्तार से ख़बरें छापीं |
लेकिन जैसा कि इराक़ की घटनाओं से साफ़ है, क़ैदियों के साथ बुरा बर्ताव न केवल अमरीकी सेना के आत्मविश्वास के लिए बुरा है, बल्कि इराक़ में अच्छे कामों के अमरीकी दावों के भी विरूद्ध है.
मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि यह केवल एक इक्का-दुक्का किस्सा नहीं है, पूरी प्रणाली ही ख़राब हैं, हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं कि हर बंधक को प्रताड़ित किया जाता है या दुर्व्यवहार किया जाता है.
इसका मतलब यह है कि इस प्रणाली में ऐसे व्यवहार को रोकने के लिए बने नियम क़ानूनों को ताक पर रख दिया गया है.
अमरीकी रक्षा मंत्री डॉनल्ड रम्सफ़ेल्ड हमेशा कहते रहे हैं कि इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के लिए कई क़ानून उपयुक्त नहीं हैं.
हालंकि बुश प्रशासन के भीतर से विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल कहते रहे हैं कि बंधको को छोड़े जाते रहना चाहिए और जो जेल में हैं उनके साथ सही माहौल में सही बर्ताव करना चाहिए.
अरब मीडिया
बीबीसी के मध्य पूर्व संवादादाता पॉल वुड बताते हैं कि दो अरबी टीवी चैनलों पर अमरीकी राष्ट्रपति बुश का इंटरव्यू दिखाए जाने के बावजूद लोगों में ग़ुस्सा बना हुआ है.
![]() अरब जगत में घटना को लेकर ग़ुस्सा है |
काहिरा के अख़बारों के मुखपृष्ठ को देखें तो उनका रूख़ यही है कि राष्ट्रपति बुश को अरब जगत को ख़ुश करने के लिए टीवी पर जाने की जहमत करनी ही नहीं चाहिए थी.
अमरीकियों के लिए समस्या यह है कि अरब दुनिया में कोई यह नहीं मानता है कि यह कोई इक्का-दुक्का तस्वीरें हैं, उनका मानना है कि अभी और बुरा देखना बाकी है.
मिस्र के विपक्षी अख़बार अल वफ़्द ने ऐसी तस्वीरें दिखाईं हैं जिनमें कहा जा रहा है कि अमरीकी सैनिक हेलीकॉप्टर से इराक़ी नागरिकों पर गोलियाँ चला रहे हैं.
एक अन्य अख़बार आहरर में और अजीबोग़रीब ख़बर है कि ऐसी अमरीकी सुरक्षा कंपनी को बग़दाद की जेलों को चलाने का ठेका दिया जा रहा है जो अख़बार के अनुसार नशीली दवाओं से और देह व्यापार से पैसा बनाने के लिए जानी जाती हैं.
एक और अख़बार की सीधी सी सुर्ख़ी है “अमरीकियों द्वारा औरतों का सामूहिक बलात्कार, अरबों की बेइज़्ज़ती”.
ब्रिटेन
ब्रिटेन के टाइम्स अख़बार के रिपोर्टर स्टीफ़न फ़रैल लिखते हैं कि कल उन्हें बग़दाद की उसी अबू ग़रेब जेल में ले जाया गया जिसकी तस्वीरों ने अमरीकियों की इतनी बदनामी की है.
लेकिन जो काम जेल की छवि सुधारने के लिए किया गया था वो उल्टा पड़ गया.
![]() अमरीकी बदनामी का कारण बनी जेल |
इतने सारे पत्रकारों को देखकर हथकड़ी बांधे क़ैदी उनकी तरफ़ दौड़े और जितने महीनों से बंद थे, वो बताने लगे.
हालाँकि उनके सामने कांटों की बाड़ थी, और पत्रकारों का उनसे बात करना या तस्वीरें ख़ीचना भी प्रतिबंधित था, उन्हें चिल्लाने से, शिकायतें करने से कोई रोक नहीं पाया.
लंदन के इंडिपेंडट अख़बार ने उस आदमी की तस्वीर छापी है जिसका कल अमरीका के न्यूयॉर्क टाइम्स ने साक्षात्कार छापा था.
34 साल के हैदर सब्बार अब्द का कहना है कि वो उन क़ैदियों में से एक है जिसे निर्वस्त्र करके, प्रताड़ित करके तस्वीरें ख़ीची गईं थीं, जिसे अब पूरी दुनिया ने देखा है.
अख़बार अपने संपादकीय में लिखता है कि इराक़ में शांति और प्रजातंत्र जो मिशन अमरीकी राष्ट्रपति ने चलाया था, जो आशा बँधाई थी, उसमें वे असफल रहे हैं और जो नुकसान हुआ है उसका अंदाज़ लगाना भी मुश्किल है.