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इराक़ में लोकतंत्र की बहाली का इंतज़ार है

इराक़ युद्ध जैसी बड़ी घटना को कवर करने की इच्छा किस पत्रकार को नहीं रही होगी.

मुझे भी यह जिज्ञासा हुई कि किसी तरह इराक़ पहुँचूँ और देखूँ कि वहाँ युद्ध ने क्या क़हर ढाया है.

सुरक्षा को लेकर दफ़्तर के निर्देशों के कारण फौरन तो इराक़ जाना संभव नहीं हुआ लेकिन अप्रैल में जैसे ही इराक़ जाने का मौक़ा मिला तो मैं कुवैत के ज़रिए इराक़ की सीमा में दाख़िल होकर बसरा पहुँच गया.

कुवैत के अबदल्ली बॉर्डर से बसरा क़रीब 70 किलोमीटर दूर है और जहाँ तक नज़र जाती है पूरा इलाक़ा वीरान और रेगिस्तान नज़र आता है.

मैं जब बसरा में दाख़िल हुआ तो पूरा शहर लुटा-पिटा और जला हुआ दिखाई दिया, सड़कों पर भारी भीड़ थी लेकिन उनके चेहरों पर उदासी और दुःख दर्द की इबारत साफ़ देखी जा सकती थी.

वीरानी

शहर के बाज़ारों में बहुत कम सामान दिखाई दे रहा था और लोग सब्ज़ी तरकारी और ज़रुरी सामान ख़रीदते नज़र आ रहे थे.

मैंने जब उनसे बात करने की कोशिश की तो अपनी रुदाद सुनाते हुए उनमें से कुछ का कहना था, "यहाँ न बिजली है, न पानी, अस्पतालों की हालत बहुत ख़राब है, दवा नहीं मिलने से बच्चे मर रहे हैं."

"अमरीकी और ब्रितानी फ़ौजी कहते हैं कि वो हमें आज़ादी दिलाने आए हैं लेकिन हमें तो कोई तबदीली नज़र नहीं आती, हालात पहले से ज़्यादा बदतर हो गए हैं."

कुछ का कहना था कि वो जिस आज़ादी की उम्मीद कर रहे थे, वो उन्हें नहीं मिली, कामकाज ठप्प हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है, कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही है.

बसरा के बाद मेरा अगला पड़ाव शिया मुसलमानों का पवित्र स्थान करबला था.

इराक़ में लगभग 60 प्रतिशत शिया हैं लेकिन वे कहते हैं कि सद्दाम हुसैन के शासन के दौरान उनपर बहुत ज़ुल्म किए गए थे, उनके धार्मिक अधिकार छीन लिए गए थे और उन्हें खुले तौरपर मातम करने और जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं थी,

लेकिन पिछले साल हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के चालीसवें दिन की बरसी के दिन जब मैं करबला में दाख़िल हुआ तो वहाँ मातम भी हो रहा था और जुलूस भी निकाला जा रहा था.

यजीद और सद्दाम

सद्दाम हुसैन के शासन का अंत हो जाने के बाद शियाओं पर लगी पाबंदियाँ ख़त्म हो गईं और एक अनुमान के मुताबिक़ गत वर्ष चेहल्लुम के मौक़े पर 10 लाख से ज़्यादा शिया करबला में इकठ्ठा हुए थे.

बसरा से करबला जाने वाली सड़क पर मैंने देखा कि हज़ारों लोग बसों, ट्रकों, छोटी गाड़ियों और कारों पर सवार थे और उन्होंने हरे और काले रंग के झंडे उठा रखे थे जिन पर लिखा था, "ला इलाहा इल्लाह" और "इस्लाम ज़िदाबाद".

साथ ही कुछ झंडों पर राजनीतिक नारे भी लिखे थे मसलन - मर्ग बर अमरीका यानी अमरीका की मौत हो. इस्लाम के समर्थन, बुश और सद्दाम के विरोध और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ आज़ादी की हिमायत करने वाले नारे भी लिखे हुए थे.

साथ ही कुछ लोग सद्दाम की तुलना यजीद से करते नज़र आए और बद-दुआएँ दे रहे थे कि ख़ुदा यजीद और सद्दाम को सज़ा ज़रुर देगा.

इराक़ पर अमरीकी हमले से भले ही देश के बहुसंख्यक शिया संप्रदाय को मज़हबी आज़ादी मिल गई हो लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति बुश की उस घोषणा पर अभी अमल होना बाक़ी है जिसमें इराक़ी जनता को सद्दाम हुसैन के शासन से मुक्ति के बाद लोकतंत्र दिलाने और अपनी सरकार बनाने का वादा किया गया था.