अमरीका ने लाखों डॉलर की एक सुरक्षा योजना की घोषणा की है जिससे इराक़ की सीमाओं से चरमपंथियों के प्रवेश को रोका जा सके.
इराक़ में अमरीकी प्रशासक पॉल ब्रेमर ने कहा है कि सीमाओं पर हज़ारों सुरक्षा कर्मियों और सैकड़ों सुरक्षा वाहनों की तैनाती की जाएगी.
करबला और बग़दाद में मंगलवार को हुए हमलों के बाद अमरीका ने यह घोषणा की है.
ग़ौरतलब है कि बग़दाद और करबला में हुए विस्फोटों में 180 से भी ज़्यादा लोग मारे गए थे.
इन हमलों के बाद इराक़ में तीन दिन का राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा है.
हज़ारों मील लंबी सीमा
पॉल ब्रेमर ने कहा है कि इन हमलों का मक़सद सुन्नी समुदाय के साथ शिया समुदाय का विवाद बढ़ाना था.
अमरीका मानता है कि इराक़ में हो रहे चरमपंथी हमले बाहर से आ रहे लोग कर रहे हैं और इसके लिए ज़रुरी है कि सीमा पर निगरानी रखी जाए.
इराक़ की हज़ारों किलोमीटर लंबी सीमा है जो कहीं रेगिस्तान में है तो कहीं पहाड़ों पर. और इन्हीं में कई जगह तस्करों के ख़ुफ़िया रास्ते हैं तो कहीं खानाबदोशों का ठिकाना जिनका उपयोग हज़ारों सालों से पीढ़ियाँ करती आई हैं.
![]() विस्फ़ोटों में 180 से ज़्यादा लोग मारे गए थे |
अमरीकी प्रशासन ने बड़ी सेना और सैकड़ों वाहनों के साथ छह करोड़ डॉलर की सहायता की घोषणा की है.
मध्य पूर्व में बीबीसी संवाददाता पॉल वुड का कहना है कि यह घोषणा अचानक ही नहीं हो गई है.
अमरीकी सेना के प्रमुख जॉन अबासैद ने कहा है कि उन्हें लगता है कि बग़दाद और करबला की घटनाओं के पीछे जॉर्डन के अलक़ायदा के गुट हैं.
और इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सीमा पर सुरक्षा को लेकर शिया नेता आयतुल्ला अली अल सिस्तानी ने अमरीका की निंदा भी की है.
यदि अमरीका उनकी इस शिकायत का जवाब नहीं देता है तो उस पर इस बात का दबाव बढ़ जाएगा कि इराक़ में सुरक्षा व्यवस्था शियाओं के हाथों में सौंप दी जाए.
लेकिन अमरीकी नेतृत्व वाली फ़ौजों के कुछ अधिकारियों को डर है कि इस निर्णय से साम्प्रदायिक तनाव बढ़ेगा जो करबला और बग़दाद के विस्फ़ोटों का मक़सद था.