फ्रांस में स्कूलों में धार्मिक चिन्हों पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक पर संसद बहस की तैयारी कर रही है.
इस विधेयक में प्रस्ताव है कि सरकारी स्कूलों में मुस्लिम लड़कियाँ हिजाब लगाना और सिख पगड़ी पहनना बंद करें.
अन्य धर्मों के चिन्हों पर भी पाबंदी का प्रस्ताव है.
इस विधेयक पर बहस में भाग लेने के लिए अनेक सांसदों को हिदायत दी गई है.
जनमत संग्रह में यह पता चला है कि ज़्यादातर लोग धार्मिक चिन्हों पर पाबंदी की हिमायत करते हैं लेकिन मुस्लिम और सिख इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं.
पूरे फ्रांस और अन्य देशों में फ्रांसीसी दूतावासों के सामने इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं.
अगर यह विधेयक पारित होने के बाद क़ानून बन जाता है तो सितंबर में स्कूल खुलने पर लागू हो जाएगा.
फ्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने कहा है कि देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि धार्मिक चिन्हों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जाए ताकि राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखा जा सके.
पेरिस में बीबीसी संवाददाता कैरोलीन व्याट का कहना है कि बहुत से लोग इस प्रस्ताव को बेढंगा और जटिल बताकर इसकी आलोचना कर रहे हैं.
संवाददाता का कहना है कि यह क़ानून विभाजनकारी भी साबित हो सकता है और मुस्लिम लड़कियाँ सरकारी स्कूलों से हटकर निजी स्कूलों में पढ़ने का रास्ता चुन सकती हैं.
लेकिन फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को मज़बूत करने के समर्थन में भी तर्क दिए जा रहे हैं.
बड़ा मुद्दा
संसद में इस विधेयक पर बहस की शुरूआत प्रधानमंत्री ज्यां पियर राफ्रें ख़ुद करेंगे. इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार के लिए यह मुद्दा कितना अहम है.
![]() सिखों ने भी विरोध किया है |
577 सदस्यों वाले निचले सदन में से क़रीब 140 ने इस विधेयक पर बहस लेने में भाग लेने के लिए अपनी सहमति दे दी है.
इस पर तीन दिन बहस होगी और अगले सप्ताह मतदान होने की संभावना है.
कुछ मुस्लिम इस पाबंदी पर सहमत हैं लेकिन ज़्यादातर का कहना है कि लड़कियों के लिए हिजाब पहनना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता के तहत आता है.
कुछ मुसलमानों का कहना है कि हिजाब लड़कियों की सांस्कृतिक पहचान है और यह क़ुरआन में बताए गए नियमों के दायरे में आता है.
दूसरी तरफ़ सिखों का भी कहना है कि पगड़ी उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक निशानी है जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है.