जापान से सैनिकों की पहली खेप इराक़ में सहायता कार्यों के लिए रवाना हो रही है.
राजधानी टोकियो में शुक्रवार को एक भव्य समारोह में इन सैनिकों को सम्मानित किया गया.
ख़ास बात यह है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जापान की यह पहली सैनिक टुकड़ी है जो किसी अशांत क्षेत्र में भेजी जा रही है.
इराक़ में वैसे इनका इस्तेमाल सिर्फ़ मानवतावादी सहायता के लिए किया जाएगा लेकिन ये पूरी तरह हथियारबंद होंगे और इस कार्रवाई की आलोचना करने वालों का कहना है कि यह क़दम जापानी संविधान के प्रतिकूल है.
लोग नाराज़ हैं
इस बारे में लोगों की राय लेने के लिए जो भी सर्वेक्षण हुए हैं उनसे पता चलता है कि वहाँ के अधिकतर लोग इस तैनाती का विरोध कर रहे हैं.
हालाँकि प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइज़ुमी का तर्क है कि जापान यदि अपने सैनिकों को विदेश भेजने का ख़तरा मोल नहीं लेगा तो वह कभी भी दुनिया में सम्मान पाने का हक़दार नहीं बन सकता.
टोकियो में बीबीसी संवाददाता जोनाथन हेड के अनुसार सैनिकों के इस दल का विदेश जाना जापान में एक नए युग की शुरुआत माना जा सकता है.
इसे व्यावहारिक रूप देने में कई दुश्वारियाँ आईं. कई महीने इसे लेकर गर्मागर्म बहस चली. लेकिन अब यह विवादास्पद मिशन पूरा होने जा रहा है.
जापान के आत्मरक्षा बल को 1945 से अब तक एक भी गोली चलाए जाने की ज़रूरत पेश नहीं आई है. लेकिन अब इस बात की पूरी संभावना है कि वह कहीं भी हमले की चपेट में आ सकता है.
और वह भी अपनी ज़मीन से कहीं दूर.