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जापान और अमरीका की गाढ़ी दोस्ती

जापानी सैनिक इराक़ भेजे जाने को लेकर आम जनता में कितना ही आक्रोश हो, प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइज़ुमी ने स्पष्ट कर दिया है कि अमरीका और ब्रिटेन के नेतृत्व में होने वाली कार्रवाइयों को उनका पूरा समर्थन हासिल है.

इराक़ पर हमले के विरोध में जापान के हज़ारों लोग सड़कों पर उतरते रहे हैं.

लेकिन इस सप्ताह के शुरू में ही टेलीविज़न पर प्रसारित एक संवाददाता सम्मेलन में कोइज़ुमी ने अमरीका के साथ जापान के पचास साल पुराने संबंधों के लिए बार-बार अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.

जापान का यह समर्थन इराक़ से प्रेरित नहीं है बल्कि एक अन्य ख़तरा जो जापान के सिर पर मंडरा रहा है, यह उसकी देन है. और वह ख़तरा है परमाणु हथियार संपन्न उत्तर कोरिया.

जुनिचिरो कोइज़ुमी जानते हैं कि यदि उत्तर कोरिया से कोई भी ख़तरा पैदा होता है तो अमरीका उनका साथ देगा.

कोइज़ुमी का कहना है, "अमरीका ने कहा है कि उसकी नज़र में जापान पर कोई भी हमला अमरीका पर हमला माना जाएगा".

उनका कहना है कि यह बयान उत्तर कोरिया को दूर रखने के लिए काफ़ी है लेकिन हमें अपने देश की सुरक्षा को ख़ुद भी सुनिश्चित करना होगा. हमें किसी भी आपातस्थिति के अनुरूप क़ानून बनाने होंगे.

उत्तर कोरिया दो अलग-अलग परमाणु कार्यक्रमों पर काम कर रहा है और हो सकता है यह कुछ महीने की ही बात हो जब वह ऐटम बमों का पूरा असलहा तैयार कर ले.

उसके पास रासायनिक और जैविक हथियारों का भंडार भी है और उन्हें ले जाने के लायक़ मिसाइलें भी.

एक बार जापान के रक्षा मंत्री ने कहा था कि यदि उत्तर कोरिया हमले की तैयारी कर रहा हो तो एहतियाती हमला भी जायज़ है.

लेकिन जापान की इस मामले में कितनी नाज़ुक स्थिति है इसका पता इसी बात से चलता है कि इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि जापान के पास ऐसा करने की क्षमता ही नहीं है.

जापान की सेना दुनिया की आधुनिकतम सेनाओं में से एक है लेकिन उसके लड़ाकू विमान घरेलू उड़ानों तक ही सीमित हैं क्योंकि उनमें बाहर कहीं ईँधन नहीं भरा जा सकता है और वह ज़मीन पर हमले में सक्षम भी नहीं हैं.

इनके अलावा जापान के संविधान के तहत भी कई सीमाएँ हैं.