इस समय यदि किसी देश के लोगों को तनाव से राहत की ज़रुरत है तो वह इराक़ है.
इसीलिए श्रीश्री रविशंकर की संस्था अपने कार्यक्रम आर्ट ऑफ़ लिविंग के साथ इराक़ पहुँच गई है.
युद्ध के बाद लगातार हिंसा का तनाव झेल रहे इराक़ी लोगों को वे योग और ध्यान सिखा रहे हैं और तनाव मुक्त करने के लिए साँस की पद्धति सिखा रहे हैं.
बैंगलोर की संस्था आर्ट ऑफ़ लिविंग फ़ाउंडेशन यह कार्यक्रम 140 देशों में चलाती है और उसने इराक़ को हाल ही में अपनी सूची में शामिल किया है.
फ़ाउंडेशन का उद्देश्य तनाव कम करना और मानव जीवन के मूल्यों के प्रति आस्था पैदा करना है.
इस संस्था के 15 कार्यकर्ता इराक़ पहुँच गए हैं जिसमें डॉक्टर भी शामिल हैं.
ये कार्यकर्ता वहाँ तनाव कम करने के लिए योग और ध्यान के अलावा पारंपरिक भारतीय दवाएँ देकर लोगों का इलाज कर रहे हैं.
इस काम की शुरुआत पिछले वर्ष सितंबर में हुई जब सात कार्यकर्ताओं ने सद्दाम के गृह नगर तिकरित के नज़दीक दिलाद गांव में जाकर पहला पहला कैंप शुरु किया.
इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोग इसमें बहुत रुचि ले रहे हैं.
उदाहरण के लिए अल कुदेसिया के कैंप में रोज़ 200 लोग आ रहे हैं.
तनाव और सदमा
इराक़ में टीम का नेतृत्व कर रहे विनोद कुमार कहते हैं, ''बमबारी के बाद लोग सदमे और तनाव में हैं.''
उनका कहना है, ''हालांकि युद्ध समाप्त हो चुका है लेकिन लोग अभी भी नहीं सो पा रहे हैं और यहाँ तक कि ठीक तरह से खाना नहीं खा पा रहे हैं.''
विनोद कुमार कहते हैं कि पुरुष बहुत ज़्यादा धूम्रपान करने लगे हैं और महिलाएँ धूम्रपान करना शुरु कर रही हैं.
उनका अनुभव है कि सोने के लिए लोग बिना कुछ सोचे समझे दवाइयाँ खा रहे हैं.
कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि यदि उन्हें सिर में दर्द होता है तो वे नींद की दवा वेलियम खा लेते हैं और दर्द के लिए वे स्टेरॉइड तक ले रहे हैं.
उनका अनुभव है कि बच्चे इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.
काम करना आसान नहीं
कार्यकर्ता उन्हें तनाव से मुक्त करने वाली साँस लेने की प्रक्रिया सिखा रहे हैं और उन्हें नुक़सान न पहुँचाने वाली भारतीय पारंपरिक दवाएँ दे रहे हैं.
उनका अनुभव है कि इराक़ी भारतीयों को बहुत पसंद करते हैं.
फ़ाउंडेशन का कार्यालय बग़दाद में है और कार्यकर्ता बताते हैं कि वहाँ काम करना आसान नहीं है.
वहाँ हर समय हेलिकॉप्टरों की आवाजें आती रहती हैं और रात में ब्लैकआउट होता है. जब तब धमाके होते रहते हैं.
लेकिन कार्यकर्ता कहते हैं कि वे कठिन काम करना पसंद करते हैं.
अगले महीने 15 कार्यकर्ताओं की एक और टीम इराक़ पहुँच रही है ताकि कुछ नए कैंप खोले जा सकें.