फ्रांस के स्कूलों में हिजाब पहनने वाली लड़कियों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है क्योंकि एक आयोग ने स्कूलों में किसी भी तरह के धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की सिफ़ारिश की है.
पूर्व मंत्री बर्नार्ड स्तासी के नेतृत्व वाले इस सरकारी आयोग ने धर्म और राष्ट्र से संबद्ध अपनी सिफ़ारिशों के विवरण दिए हैं.
फ़्रांसीसी राष्ट्रपति शिराक अगले हफ़्ते इस बात का ऐलान करेंगे कि वह आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करेंगे या नहीं.
जिन चीज़ों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा है उनमें यहूदियों की टोपियाँ और ईसाई धर्म की प्रतीक सलीबें भी शामिल हैं.
आयोग के अध्यक्ष ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपने से पहले इस बारे में कई अध्यापकों, धार्मिक नेताओं, समाजशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों से बात की.
रिपोर्ट हालाँकि फ़्रांस में धर्मनिरपेक्षता के व्यापक मुद्दे पर आधारित है लेकिन अब बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि स्कूलों में लड़कियाँ सिर पर स्कार्फ़ बाँधे या नहीं.
आयोग की सिफ़ारिशें यदि मान ली जाती हैं तो यहूदी किप्पा, मुस्लिम हिजाब और ईसाई सलीबों का स्कूलों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा.
हालाँकि गले में पहनने वाली चेन में ऐसे पेंडेट की अनुमति होगी जो पहनने वाले के धर्म का आभास भर दिलाते हैं और जिनका प्रमुखता से प्रदर्शन न किया गया हो.
स्तासी ने बृहस्पतिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "मुसलमानों को यह बात समझनी चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता इस्लाम के लिए एक मौक़ा है".
धर्मनिरपेक्षता की परंपरा
फ़्रांस के सार्वजनिक जीवन में धर्मनिरपेक्षता की परंपरा रही है जो 1789 की क्रांति के समय से ही जारी है. लेकिन आयोग की सिफ़ारिश है कि इसे क़ानून का रूप दे दिया जाए.
राष्ट्रपति शिराक अगले हफ़्ते राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं और उन्होंने संकेत दिया है कि वह धार्मिक प्रतीकों पर औपचारिक प्रतिबंध को समर्थन दे सकते हैं.
यूरोपीय संघ में फ़्रांस एक ऐसा देश है जहाँ सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी है. वहाँ के लगभग पचास लाख निवासी मुसलमान हैं.
पेरिस में बीबीसी की कैरोलाइन वायट का कहना है कि हिजाब को लेकर फ़्रांस में एक राष्ट्रीय बहस का माहौल पैदा हो गया है.
उनका कहना है कि इससे कई लोगों की यह आशंकाएँ ज़ाहिर होती हैं कि फ़्रांस वहाँ की मुस्लिम आबादी को पूरी तरह आत्मसात करने और उन्हें फ़्रांसीसी संस्कृति की पहचान देने में विफल रहा है.