अमरीका के दक्षिणी राज्य लुइसिआना में गवर्नर पद के लिए चुनाव लड़ रहे भारतीय मूल के बॉबी जिंदल की उम्मीदवारी से भारतीय मूल के अमरीकी काफ़ी उत्साहित हैं.
गवर्नर बनने वाले भारतीय मूल के पहले व्यक्ति होने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के जिंदल का सामना डेमोक्रेटिक पार्टी की कैथलीन ब्लांको से है.
वैसे परिणाम किसी के भी हक़ में क्यों न हो राज्य के लिए एक मायने में ऐतिहासिक ही होंगे क्योंकि अब तक वहाँ सिर्फ़ गोरे ही गवर्नर होते आए हैं और कोई महिला भी अब तक गवर्नर नहीं बनी है.
लुइसिआना राज्य में लगभग 15,000 दक्षिण एशियाई लोग हैं और इन लोगों में जिंदल के लिए काफ़ी समर्थन भी दिख रहा है.
इन लोगों के दिलों में उम्मीद है कि मूल रूप से भारत के पंजाब प्रांत से जुड़े जिंदल उनकी मुश्किलें समझ पाएँगे.
वैसे जिंदल ने युवावस्था के दौरान ईसाइयत स्वीकार कर ली थी मगर फिर भी इन लोगों को उम्मीद है कि भारत से होने के कारण वह दूसरों के मुक़ाबले उनकी बात बेहतर ढंग से समझेंगे.
मगर ऐसा नहीं है कि पूरा का पूरा भारतीय समुदाय उनके साथ है क्योंकि धर्म परिवर्तन की वजह से उनके कुछ विरोधी भी हो गए हैं जो उन्हें 'अवसरवादी' कहते हैं.
ज़बरदस्त समर्थन
जैसे-जैसे चुनाव अभियान तेज़ हो रहा है वैसे-वैसे नौकरी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मसले प्रमुखता से सामने आ रहे हैं.
वैसे जिंदल को इस बात का फ़ायदा होगा कि लुइसिआना पारंपरिक तौर पर रिपब्लिक पार्टी का ही गढ़ रहा है और निवर्तमान गवर्नर माइक फ़ॉस्टर इसी पार्टी के हैं.
वह सिर्फ़ 32 वर्ष के हैं और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभा चुके हैं. इस विभाग के प्रमुख के तौर पर उन्होंने 40 करोड़ डॉलर के घाटे को एक अरब डॉलर के फ़ायदे में बदल दिया था.
उनकी यही मेहनत थी जिसकी वजह से राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने उन्हें अपने प्रशासन में स्वास्थ्य नीति के एक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया था.
उनकी एक समर्थक शिल्पा कहती हैं, "राजनीतिक अभियान में धर्म मायने नहीं रखता बल्कि उम्मीदवार क्या सोचता है और राज्य में ज़िदग़ी बेहतर करने के लिए क्या करता है ये अहम है."
मगर पाकिस्तानियों के दिल में उनकी उम्मीदवारी को लेकर कुछ शंकाएँ हैं.
पाकिस्तानी मूल के अमरीकियों की कांग्रेस के प्रमुख अशरफ़ अब्बासी का कहना है कि वे अपने समुदाय के लोगों से कहेंगे कि वे एकजुट होकर जिंदल को हराएँ.
फिर भी एक पाकिस्तानी जावेद इक़बाल का कहना है कि कुछ पाकिस्तानी जिंदल का समर्थन भी कर रहे हैं क्योंकि किसी बाहरी के मुक़ाबले तो जिंदल अच्छे ही होंगे.
गोरे और काले लोगों के मत
वैसे जिंदल को अफ़्रीकी मूल के अमरीकियों के मतों की चिंता करनी होगी.
उम्मीद की जा रही है कि उन्हें गोरों के मत तो मिल जाएँगे मगर राज्य के काले लोग ब्लांको का समर्थन कर सकते हैं.
वह उन मतों में से शायद 10 फ़ीसदी भी नहीं पा पाएँ मगर उनके प्रवक्ता का कहना है कि वे सभी लोगों को साथ लेना चाहते हैं.
वैसे अब ये चुनाव गोरे या काले के स्तर से ऊपर भी उठ चुका है क्योंकि जिंदल के ईसाई हो जाने की वजह से कुछ भारतीय भी उनका विरोध कर रहे हैं.
हालाँकि जिंदल को कुछ बढ़त ज़रूर है मगर पलड़ा अब भी बराबरी पर है और किसी भी ओर झुक सकता है.