अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने एक समझौता करने में सफलता पाई है जिसके तहत विकासशील देशों को एड्स की सस्ती दवा हासिल हो सकेगी.
इस समझौते के तहत चार दवा कंपनियाँ पेंटेंट दवाइयों की वर्तमान क़ीमतों से एक तिहाई क़ीमत पर दवा उपलब्ध करवाएंगी.
इनमें से तीन कंपनियाँ भारत की हैं और एक दक्षिण अफ़्रीका की.
ये कंपनियाँ वे दवाएं बनाती हैं जो पेटेंट नहीं हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर के अनुसार भारत की दवा कंपनियों में रैनबैक्सी लेबोरेटरीज़ लिमिटेड, सिप्ला लिमिटेड और मैट्रिक्स लिमिटेड हैं.
इस समझौते के तहत दवा की क़ीमत डेढ़ डॉलर यानी सत्तर रुपए से घटकर बीस रुपए हो जाएगी.
क्लिंटन फ़ाउंडेशन
यह समझौता विलियम जे क्लिंटन प्रेसिंडेंशियल फ़ाउंडेशन ने किया है.
क्लिंटन ने कहा है कि इससे उन जगहों पर भी इलाज की शुरुआत हो पाएगी जहाँ या तो इलाज की सुविधा थी ही नहीं या थी तो बहुत महंगी थी.
इससे न केवल सस्ती दवा उपलब्ध होगी बल्कि इसका समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि इससे ग़रीब देशों में यह भरोसा भी पैदा हो पाएगा कि वे एड्स के लिए लंबे समय तक इलाज का इंतज़ाम कर सकते हैं.
उनका कहना था कि 2008 तक बीस लाख लोगों को कम क़ीमतों वाली दवा उपलब्ध हो जाएगी.
दवा कंपनियों को दवा की क़ीमतों में कटौती का उपाय क्लिंटन फ़ाउंडेशन ने सुझाया था.
इन दवा की क़ीमत चुकाने के लिए फ़ाउंडेशन आयरलैंड और कनाडा सहित कई अमीर देशों से पैसा उगाहेगा.
क्लिंटन फ़ाउंडेशन रवांडा, तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक सहित कई अफ़्रीकी देशों में काम कर रहा है.
इसके लिए विश्व बैंक और ग्लोबल फ़ंड ने धन उपलब्ध करवाया है.