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यूरोपीय संविधान पर चर्चा

इटली की राजधानी रोम में शनिवार को यूरोपीय संघ की एक दिवसीय बैठक हुई.

इस बैठक के साथ ही यूरोप के पहले संविधान पर अंतिम चर्चा की शुरुआत हो गई है.

इससे यूरोपीय संघ के देशों के बीच कूटनीति और पर्दे के पीछे सौदेबाज़ी की चर्चाओं की शुरुआत हो गई है.

यूरोपीय संघ की अगली बैठक ब्रसेल्स मे दो हफ़्ते बाद होनी है.

इटली चाहता है कि इस मामले को तेज़ी से निपटाया जाए लेकिन सदस्य देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस मामले में कोई हड़बड़ी नहीं चाहते.

उनका कहना है कि यूरोपीय संघ का पहला संविधान अपने आपमें महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामला है.

मतभेद

शनिवार की बैठक में संघ से मौजूदा 15 सदस्य देशों के नेताओं के अलावा उन 10 देशों के नेता भी शामिल थे जो अगले वर्ष संघ के सदस्य बनेंगे.

ज़्यादातर देशों के लिए मतभेद का एक ही मुद्दा है - यूरोपीय संघ में किसके पास कितनी शक्ति होगी और कौन सबसे प्रभावशाली देश होगा.

रोम के कनवेन्शन सेंटर में सिर्फ़ एक दिन की इस बैठक पर लगभग दो करोड़ डॉलर का ख़र्च आया.

कनवेन्शन सेंटर तक पहुँचाने वाली ज़्यादातर सड़कों पर पुलिस तैनात थी और इस तरफ़ आनेवाले सभी लोगों की तलाशी ली गई.

इटली की बेचैनी

सुबह इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लूस्कोनी ने स्वयं कनवेन्शन सेंटर पर यूरोपीय नेताओं का स्वागत किया.

लेकिन जानकारों का कहना है कि बातचीत अगले साल तक खिच सकती है क्योंकि छोटे देशों को डर है कि उनकी आवाज़ बड़े और प्रभावशाली देशों के बीच दब न जाए.

पोलैंड के प्रधानमंत्री लेस्ज़ेक मिलर इस बैठक में अपने पक्ष रखने की पूरी तैयारी में नज़र आए.

उन्होंने कहा," अगर आप संघर्ष नहीं करेंगे तो आपकी हार निश्चित है".

यूरोपीय संघ का प्रस्तावित संविधान 16 महीनों की बहस के बाद इस साल जून में प्रस्तुत किया जा सका था.

परिवर्तन

यूरोपीय संघ के प्रस्तावित संविधान में कुछ मूलभूत परिवर्तन किए गए हैं.

इनके तहत सरकारों के पास वीटो को लिए कम शक्तियाँ रहेंगी.

यूरोपीय संसद अधिक शक्तिशाली होगा.

यूरोपीय संघ का एक विदेश मंत्री होगा और यूरोपीय आयोग के आयुक्तों की संख्या कम कर दी जाएगी.

प्रस्तावित संविधान से यूरोपीय संघ की बुनियाद रखने वाले सभी मूल सदस्य देश, जर्मनी, फ़्रांस, इटली, नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्समबर्ग संतुष्ट लग रहे हैं.

पोलैंड और स्पेन मतदान की प्रणाली में प्रस्तावित परिवर्तनों से नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें डर है कि इससे उनके कुछ अधिकारों को क्षति पहुँचेगी.

सदस्यों देशों में इस बात को लेकर भी ग़हरे मतभेद हैं कि संविधान में ईश्वर, ईसाइयत और धर्म को लेकर साफ़-साफ़ उल्लेख होना चाहिए.

पोलैंड, स्पेन और इटली जैसे कुछ रोमन कैथोलिक देश इस बात की माँग कर रहे हैं कि धर्म को यूरोपीय संघ के संविधान में स्थान मिलना चाहिए जबकि फ्रांस ने इसका ज़ोरदार विरोध किया है.