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बर्बादी की बारूदी सुंरगें जिन पर पाबंदी भी काम न आई
बारूदी सुरंगें दुनिया के एक बड़े हिस्से में बिछी हैं और ये एक गंभीर समस्या है. पिछले ही महीने ओटावा संधि को 25 साल पूरे हुए हैं. हम इस संधि का ज़िक्र इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि इसमें सैनिकों को निशाना बनाने वाली बारूदी सुरंगों पर पाबंदी लगाई गई थी.
इसे दुनिया की सबसे सफल निरस्त्रीकरण संधियों में से एक माना जाता है. लेकिन बारूदी सुरंगों से मुक्त दुनिया अभी तक मुमकिन नहीं हो पाई है और इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं है.
इस समझौते पर दिसंबर 1997 में दस्तख़त किए गए थे. कुल 164 देशों ने इस समझौते पर दस्तख़त किए हैं, जो इसकी शर्तों को पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसी बड़ी ताक़तों ने इस समझौते पर दस्तख़त नहीं किए हैं.
लैंडमाइन मॉनिटर ग्रुप की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिकों को निशाना बनाने के लिए बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल जारी है, जिसकी वजह से आम नागरिक भी मारे जा रहे हैं और कई ज़िंदगियां तबाह हो रही हैं.
बारूदी सुरंगों से जूझने वाला एक और देश है लेबनान, जहां हर दिन एक बड़ा डि-माइनिंग ऑपरेशन चलाया जाता है. देखिए बीबीसी संवाददाता एना फोस्टर की ये ग्राउंड रिपोर्ट.
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