विवेचना: गुरु तेग़ बहादुर की कहानी, जान दी पर झुके कभी नहीं

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11 अगस्त 1664 को दिल्ली से सिखों का एक जत्था पंजाब के गाँव बकाला पहुँचा. छह महीने पहले आठवें गुरु हरकिशन ने अपने निधन से पहले एलान किया था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला में मिलेगा.

बकाला में सिखों की ख़ास सभा बुलाकर तेग बहादुर को गुरु की गद्दी देने का एलान किया गया. एक पारंपरिक समारोह में गुरदित्ता रंधावा ने गुरु के माथे पर केसर तिलक लगाकर उन्हें एक नारियल और पाँच पैसे भेंट करके उन्हें गुरु की गद्दी पर बिठाया. गुरु तेग बहादुर का जन्म वर्ष 1621 में हुआ था.

वो छठे सिख गुरु हरगोबिंद के सबसे छोटे बेटे थे. गुरु तेग बहादुर ने अपने परिवार और साथियों से विदा ली और घोषणा की कि उनके बाद उनके बेटे गोबिंद राय को अगला गुरु बनाया जाए. 11 जुलाई, 1675 को गुरु तेग बहादुर अपने पाँच अनुयायियों भाई मति दास, उनके छोटे भाई सती दास, भाई दयाला, भाई जैता और भाई उदय के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुए. थोड़ी दूर चलने के बाद उन्होंने आगे की ख़बर लेने के लिए भाई उदय और भाई जैता को दिल्ली के लिए रवाना कर दिया.

वीडियो: रेहान फ़ज़ल और देवाशीष कुमार

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