तालिबान के लिए 'लाइफ़लाइन' कैसे बने तुर्की-क़तर?

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अमेरिका की आख़िरी फ़्लाइट काबुल हवाई अड्डे से उड़ते ही तालिबान के लड़ाकों ने जश्न में ख़ूब फ़ायरिंग की. लेकिन अकेले हथियारों के दम पर दुनिया में अलग-थलग पड़े तालिबान लाखों अफ़ग़ानों को अनिश्चित भविष्य से बाहर नहीं निकाल पाएंगे.

सारी दुनिया तालिबान की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अपना दबाव बनाने की तैयारी कर रही है. लेकिन इन सबके बीच दो मुस्लिम देश, मध्यस्थ और सूत्रधार के रूप में उभर रहे हैं. ये देश हैं - क़तर और तुर्की. दोनों हाल के वर्षों में तालिबान से हुई नज़दीकी का फ़ायदा उठा रहे हैं.

दोनों को अफ़ग़ानिस्तान में अवसर दिख रह है. लेकिन दोनों एक जुआ भी खेल रहे हैं. एक ऐसा जुआ जो मध्य पूर्व में पुरानी प्रतिद्वंद्विता को और भी हवा दे सकता है. गैस के समृद्ध भंडार वाले छोटे से खाड़ी देश क़तर के अधिकारियों ने अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल रहे कई लोगों को जीवनदान दिया है.

रिपोर्ट: टॉम बेटमैन

आवाज़: मोहम्मद शाहिद

वीडियो एडिटिंग: देबलिन रॉय

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