उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर उत्तराखंड में भी नए जनसंख्या क़ानून की आहट

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उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि राज्य की भाजपा सरकार 'बहुत जल्द जनसंख्या नियंत्रण वाले एक क़ानून को लागू करने के बारे में फ़ैसला करेगी."

बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव के साथ एक ख़ास बातचीत में उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि उनकी सरकार एक भू-क़ानून और दूसरे मामलों पर आपस में विचार-विमर्श कर के निर्णय लेगी."

उन्होंने कहा कि पुराने फ़ैसलों को बदलने के बारे में वे किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर काम नहीं करेंगे, लेकिन जो उत्तराखंड की जनता और राज्य के हित में होगा, उसके लिए निश्चित तौर पर क़दम उठाए जाएँगे.

कोरोना महामारी और वायरस-संक्रमण के ख़तरों के बीच उत्तराखंड से शुरू होने वाली सालाना कांवड़ यात्रा के होने या न होने पर उनका जवाब था, "ये करोड़ों लोगों की आस्था का विषय है. लेकिन लोगों के स्वास्थ्य संबंधी हित सर्वोपरि हैं और किसी की जान को ख़तरा नहीं होना चाहिए. जान बचाना हमारी पहली प्राथमिकता है और अगर इसे रोकना पड़ा तो फ़ैसला लिया जाएगा. लेकिन सभी राज्यों से बात करने के बाद."

ग़ौरतलब है कि उत्तराखंड में भाजपा सरकार की ख़ासी आलोचना हुई थी, क्योंकि हरिद्वार कुंभ के आयोजन और उसके बाद से कोरोना संक्रमण के मामले देश भर में दर्ज किए गए थे.

तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कोविड-19 की जाँच वाले आरटीपीसीआर टेस्ट से भी श्रद्धालुओं को छूट दे दी थी. जानकरों का कहना है कि कम आबादी वाले सुदूर पहाड़ी इलाक़ों से लेकर दूसरे शहरों में वापस लौटे कई श्रद्धालु संक्रमित पाए गए थे.

जहाँ कुंभ में महीने भर के दौरान राज्य में आने-जाने वाल लोगों की संख्या 70 लाख बताई गई थी, वहीं हरिद्वार से सालाना होने वाली कांवड यात्रा में दो करोड़ से अधिक लोग दो हफ़्तों के भीतर ही प्रदेश से होकर अपने अपने राज्यों को लौटते हैं.

दो बार खटीमा विधानसभा क्षेत्र से चुने जाने वाले पुष्कर सिंह धामी के चयन को भाजपा ने "युवा के हाथों में बागडोर देना" ठहराया है. वैसे, पिछले चार महीनों में धामी प्रदेश के तीसरे भाजपा मुख्यमंत्री हैं और इनसे ठीक पहले तीरथ सिंह रावत का कार्यकाल महज़ चार महीने रहा था.

हालाँकि उत्तराखंड के 21 सालों के इतिहास में धामी 11वें मुख्यमंत्री हैं और ये पूछे जाने पर कि पार्टी आगामी चुनावों में इस बात को कैसे नकार सकेगी की लीडरशिप की कमी है और क्या उन्हें सिर्फ़ डैमेज कंट्रोल के लिए उतारा गया है? उनका जवाब था, "मुझे पहले से बिलकुल भी जानकारी नहीं थी कि मेरा चयन किया गया है."

उन्होंने कहा, "ये ज़रूर है कि मुख्यमंत्री कई बार बदले गए लेकिन जिसको भी दायित्व दिया जाता है सभी लोग उसके इर्द-गिर्द जुटकर काम करते हैं. और मैं पूर्व मुख्यमंत्रियों के कम कार्यकाल को चुनौती नहीं मानता क्योंकि भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है और सारा परिवार है. केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से उतराखंड में काम भी हुआ है."

जनसंख्या नियंत्रण क़ानून

प्रदेश में जनसंख्या क़ानून की बात करने वाले पुष्कर सिंह धामी पहले मुख्यमंत्री हैं और उनका ये बयान अहम इसलिए भी साबित होगा क्योंकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश ने हाल ही में विपक्ष के विरोध के बीच जनसंख्या नियंत्रण के लिए 'दो बच्चों की नीति" लागू करने की बात कही है.

इससे पहले असम में भाजपा सरकार ऐसी ही नीति लागू भी कर चुकी है. असम के बाद अब यूपी के विधि आयोग ने चर्चा में आए 'उत्तर प्रदेश पॉपुलेशन (कंट्रोल, स्टेबलाइज़ेशन एंड वेलफ़ेयर) बिल' का मसौदा तैयार किया है.

मसौदे में इस बात की सिफ़ारिश की गई है कि 'दो बच्चों की नीति' का उल्लंघन करने वालों को स्थानीय निकाय के चुनाव में हिस्सा लेने की इजाज़त नहीं होगी. उन्हें सरकारी नौकरी में आवेदन करने और प्रमोशन पाने पर रोक लगाई जाए. उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाली किसी भी सब्सिडी का लाभ नहीं मिले.

उत्तराखंड और भू-क़ानून

उत्तराखंड राज्य में पिछले कई वर्षों से जारी स्थानीय लोगों की कृषि ज़मीन की रक्षा करने वाले एक भू-क़ानून की माँग दरअसल कोरोना वायरस के फैलने के बाद से और व्यापक हो गई है.

उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के कई नेताओं ने भी उत्तराखंड भूमि-कानून को आर्टिकल 371 में शामिल करने और वर्ष 1980 से पहले से निवास करने वालों को ही उत्तराखंड का मूल निवासी मानने की मांग लगातार उठाई है.

कोविड-19 और उसके बाद हुए दो लॉकडाउन के बीच प्रदेश में कई सामाजिक और युवा ग्रुप्स ने सोशल मीडिया पर इस बात के ख़िलाफ़ कैम्पेन छेड़ रखा है कि "बाहरी लोगों ने उत्तराखंड के शांत और ख़ूबसूरत पहाड़ी इलाक़ों में पर्यटन और व्यवसाय के नाम पर बड़ी ज़मीनें ख़रीद कर स्थानीय लोगों को दरकिनार कर रखा है."

इस मामले पर बोलते हुए पुष्कर सिंह धामी ने कहा, "भू-क़ानून या जनसंख्या जैसे क़ानून की बात हो रही है. जो भी उत्तराखंड के हित में होगा वो करेंगे. सिर्फ़ एक दो मुद्दे नहीं हैं, जितनी भी बातें लोगों से बात करेंगे-चर्चा करेंगे और हल निकालेंगे."

भू-क़ानून के मामले ने तूल इसलिए भी पकड़ा हुआ है, क्योंकि लॉकडाउन और उसके बाद बड़े शहरों से पहाड़ों में जाकर लोगों नें कृषि भूमि में छोटे-बड़े प्लॉट्स ख़रीदने शुरू कर दिए हैं.

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