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कोरोना संकट: कहीं थाली से ग़ायब न हो जाएं रोटियां
कोरोना महामारी के दौर से जुड़ी कुछ तस्वीरें ताउम्र याद रहेंगी. जैसे कि खाली सड़कें, बिना दर्शकों के स्टेडियम, दुनिया के बड़े नेताओं से लेकर आम लोगों के मास्क से ढंके चेहरे.
हम लोगों में से कई लोगों को दुकानों पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारें, आस-पास के लोगों से भी मजबूरन मोबाइल पर बात करना और ख़ाली सुपरमार्केट... जैसी यादें हमेशा डराया करेंगी.
मगर लॉकडाउन के शुरू होते ही दुकानों की शेल्फ़ का खाली हो जाना कई सवाल भी उठा रहा है.ब्रिटेन में तो पब और स्कूल के बंद होने और मास्क के अनिवार्य किए जाने के पहले ही सुपर मार्केट के शेल्फ खाली हो गए थे.अ
मरीका में कई जानवरों को मार दिया गया क्योंकि उन्हें खाना देना मुमकिन नहीं था. लोगों को दूध नालियों में बहाना पड़ा. इस महामारी ने हमें यह अहसास दिलाया कि हमारी फ़ूड सप्लाई चेन कितनी नाज़ुक है. लेकिन क्या हमने इससे कुछ सीखा है?
क्या भविष्य में हम किसी ऐसी ही स्थिति का सामना करने के लिए बेहतर तैयार होंगे? जानकार मानते हैं कि विकसित देशों में खाने की आपूर्ति की समस्या शुरुआती झटकों के बाद ठीक हो गई, लेकिन विकासशील देशों के सामने एक नई समस्या खड़ी होने लगी क्योंकि उनकी मज़दूरों पर निर्भरता बहुत अधिक है.
स्टोरी: जेम्स वॉन्ग
आवाज़: भरत शर्मा
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