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पाकिस्तान के ख़िलाफ़ 'आज़ाद पख़्तूनिस्तान' की बुनियाद रखने वाला 'अकेला योद्धा'
राजधानी इस्लामाबाद से जब श्रीनगर हाइवे पर बढ़ते हैं तो जिस चौराहे से रावलपिंडी का रास्ता निकलता है, वहीं एक उदास सा लिंक रोड है. इस लिंक रोड के शुरू में एक बोर्ड लगा हुआ है जिससे पता चलता है कि इस रोड का नाम फ़क़ीर ईपी रोड है.
शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़क़ीर ईपी कौन थे. एक पश्तून बुद्धिजीवी, डॉक्टर अब्दुलहयी ने व्यंग्यात्मक रूप से इस सवाल का जवाब यूं दिया है कि "हम नहीं जानते कि वह कौन थे?" फिर शिकायती अंदाज़ में कहा कि उन्हें इतिहास में उनके सही स्थान से वंचित रखा गया है.
इतिहास में सही स्थान मिलने या न मिलने की बहस अपनी जगह अहम है. और दिलचस्प होने के साथ इसकी एक विस्तृत पृष्ठभूमि है. लेकिन इसके बावजूद इतिहास फिर भी अपने गंभीर पाठक को बताता है कि बीसवीं सदी के मध्य में, जब उपमहाद्वीप का कोना-कोना आज़ादी के नारों से गूंज रहा था.
स्टोरी: फ़ारूक़ आदिल, स्तंभकार और लेखक
आवाज़: पायल भुयन
एडिटिंग/मिक्सिंग: रुबाइयत बिस्वास/अजीत सारथी
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