पिंजरे में एक किशोर की प्रदर्शनी लगाने के लिए 114 साल बाद माफ़ी

अमरीका में ओटा बेंगा एक बंदर के साथ

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ओटा बेंगा को 1904 में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो से किडनैप किया गया और प्रदर्शित करने के लिए अमरीका ले जाया गया.

ओटा बेंगा के साथ दशकों तक जो हुआ उसे कवर करने की कोशिश पत्रकार पामेला न्यूकिर्क ने की है. उन्होंने इस विषय पर काफी गहराई से लिखा है.

एक युवा अफ्रीकी शख्स को मंकी हाउस में प्रदर्शनी के लिए रखे जाने के मामले के अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आने के एक सदी के बाद न्यूयॉर्क के ब्रॉन्क्स ज़ू ने आखिरकार अफसोस जताया है.

वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी (डब्ल्यूसीएस) के 1906 में ओटा बेंगा की प्रदर्शनी के लिए माफी मांगे जाने का मामला ऐसे वक्त पर सामने आया है जबकि पूरी दुनिया में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के चलते विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और अमरीका में नस्लभेद का मामला सुर्खियां बना हुआ है.

वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन सोसाइटी के प्रेसिडेंट और सीईओ क्रिश्चियन सैंपर ने कहा है कि डब्ल्यूसीएस के अपने इतिहास और हमारे संस्थान में मौजूद नस्लभेद को दिखाने के लिए ऐसा करना ज़रूरी था.

उन्होंने कहा कि ब्रॉन्क्स जू़ चलाने वाली सोसाइटी खुद को इस एपिसोड के बारे में पूरी पारदर्शिता के लिए रखेगी. इस घटना ने पूरे यूरोप और अमरीका को 9 सितंबर 1906 के बाद से सुर्खियों में ला दिया था. इसके एक दिन पहले ओटा बेंगा को पहली बार प्रदर्शित किया गया था और 28 सितंबर 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया था.

लेकिन, यह माफी सालों तक इस मसले पर पर्दा डाले रहने के बाद आई है.

साल 1994 की एक तस्वीर में ओटा बेंगा

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'वो एक जू़ कर्मचारी थे'

इस घटना को एक सबक के तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन सोसाइटी एक सदी तक इस घटना पर पर्दा डालने में लगी रही. इस दौरान सोसाइटी ने या तो गुमराह करने वाली कहानियों को सक्रिय रूप से जारी रखा या फिर वह इन्हें रोकने में नाकाम रही.

जू़ के आर्काइव्स में मौजूद 1906 का एक पत्र बताता है कि बढ़ती आलोचना के बीच अधिकारियों ने यह फर्ज़ी कहानी बनाने की कोशिश की कि ओटा बेंगा वास्तव में जू़ के एक कर्मचारी थे. ताज्जुब की बात यह है कि दशकों तक यह फरेब चलता रहा.

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कौन थे ओटा बेंगा?

  • मार्च 1904 में उन्हें अमरीकी व्यापारी सैमुअल वर्नर ने उस वक्त के बेल्जियन कॉन्गो से पकड़ा था. उनकी उम्र तब शायद 12 या 13 साल थी.
  • उन्हें पानी के जहाज़ से प्रदर्शनी के लिए न्यू ओरलियांस लाया गया. उनके साथ आठ और युवा पुरुष थे.
  • सेंट लुइस में हुए वर्ल्ड्स फे़यर में सर्दियों में उन्हें प्रदर्शित किया गया जहां इस ग्रुप के पास पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे.
  • सितंबर 1906 में उन्हें 20 दिन के लिए न्यूयॉर्क के ब्रॉन्स्क जू़ में प्रदर्शित किया गया, उन्हें देखने के लिए बड़ी तादाद में भीड़ आती थी.
  • ईसाई मंत्रियों के विरोध के बाद उन्हें रिहा किया गया और उन्हें न्यूयॉर्क के होवार्ड कलर्ड ऑर्फन एसायलम ले जाया गया.
  • जनवरी 1910 में वो लिंचबर्ग थियोलॉजिकल सेमिनरी और वर्जीनिया के कॉलेज फ़ॉर ब्लैक स्टूडेंट्स में रहने गए.
  • बताया जाता है कि बाद में वो अपने घर जाने को लेकर डिप्रेस हो गए और मार्च 1916 में उन्होंने खुद को गोली मार ली. माना जाता है कि उस वक्त वो 25 साल के थे.

स्रोतः स्पेक्टेकलः द एस्टोनिशिंग लाइफ़ ऑफ़ ओटा बेंगा

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1916 में ओटा बेंगा की मौत के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स के एक आर्टिकल में कहा गया था, "इसी नौकरी की वजह से उस बेबुनियाद रिपोर्ट को हवा मिली जिसमें कहा गया था कि उन्हें बंदरों के पिंजरे में प्रदर्शनी के लिए पार्क में रखा गया था."

यह आर्टिकल हालांकि, एक दशक पहले यूरोप और यूएस के तमाम न्यूज़पेपरों में छपे आर्टिकल्स के उलट था.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अकेले ही इस मसले पर एक दर्जन आर्टिकल छापे थे. इसमें सबसे पहला 9 सितंबर 1906 को इस हेडलाइन से छपा थाः "बुशमैन शेयर्स अ केज विद ब्रॉन्क्स पार्क एप्स" यानी शिकारी को ब्रॉन्स्क पार्क में बंदरों के पिंजरे में रखा गया.

1974 में जू के क्यूरेटर एमेरिटस विलियम ब्रिजेस ने दावा किया कि जो हुआ था वह शायद कभी पता नहीं चल पाएगा.

अपनी किताब 'द गैदरिंग ऑफ़ एनिमल्स' में वो पूछते हैं, "क्या ओटा बेंगा को प्रदर्शित किया गया था- किसी अजीब, दुर्लभ जानवर की तरह से?" यह एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब जू़ आर्काइव्स के अगुवा के तौर पर वो शायद अच्छी तरह से दे सकते थे.

वो लिखते हैं, "उसे एक खाली पिंजरे में कुछ घंटों के लिए देखे जाने के लिए रखा जाना हकीकत नहीं जान पड़ता है." इस तरह से उन्होंने ज़ूलॉजिकल सोसाइटी की आर्काइव्स के पास मौजूद साक्ष्यों को नज़रअंदाज कर दिया.

इस प्रदर्शनी के बारे में ज़ू के डायरेक्टर का लिखा एक लेख ज़ूलॉजिकल सोसाइटी के ख़ुद के पब्लिकेशन में छपा था.

साल 2016 की इस तसवीर में ब्रॉन्क्स पार्क

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पकड़ने वाले और पकड़े गए के बीच दोस्ती

1992 में सैमुअल वर्नर के पोते ने एक किताब लिखी. इस किताब को वर्नर और ओटा बेंगा की दोस्ती की कहानी के तौर पर चित्रित किया गया था.

वर्नर के पोते ने यह भी दावा किया कि ओटा बेंगा, जिन्होंने अपनी गुलामी का भरसक विरोध किया, उनको न्यूयॉर्क के लोगों के सामने प्रदर्शन करके अच्छा लगता था.

ऐसे में एक सदी से ज़्यादा वक्त तक संस्थान और ओटा बेंगा का बुरी तरह से शोषण करने वाला शख्स और उसकी पीढ़ियां ऐतिहासिक रिकॉर्ड को तोड़मरोड़ कर पेश करते रहे और पूरी दुनिया में एक फर्ज़ी कहानी चलाते रहे.

यहां तक कि अभी भी सैंपर ने ओटा बेंगा को कई दिनों तक प्रदर्शित करने के लिए माफी मांगी है न कि इसके लिए कि उन्हें तीन हफ्ते तक मंकी हाउस में बंदी बनाकर रखा गया था.

ज़ू ने अब ऑनलाइन डिजिटाइज्ड डॉक्युमेंट्स पोस्ट किए हैं जिसमें इस पूरी घटना का ज़िक्र है. इसमें लेटर्स हैं जिनमें ओटा बेंगा की रोज़ाना की गतिविधियों और उन्हें पिंजरे में रखने वाले लोगों का ज़िक्र है.

इनमें से कई लेटर्स 2015 में पब्लिश हुई मेरी किताब, 'स्पेक्टेकलः द एस्टोनाइज़िंग लाइफ़ ऑफ़ ओटा बेंगा' में छपे हैं.

इस किताब के पब्लिकेशन के पांच साल में ज़ू अधिकारियों ने माफी मांगने और यहां तक कि मीडिया पूछताछ पर प्रतिक्रिया देने तक से इनकार किया है.

वर्ल्ड्स फ़ेयर

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इमेज कैप्शन, 1904 में आयोजित वर्ल्ड्स फ़ेयर में चार अफ्रीकियों को प्रदर्शित किया गया था, इनमें से एक ओटा बेंगा था. उन चारों को 'पिग्मी' कह कर प्रदर्शित किया गया था

'मंकी हाउस में सबसे अच्छा कमरा'

अब सैंपर कहते हैं, "हमें बेहद खेद है कि कई लोगों और पीढ़ियों को इन कदमों या हमारे पहले सार्वजनिक रूप से निंदा न करने या इसका विरोध न करने की वजह से नुकसान हुआ है."

उन्होंने संस्थापक सदस्यों मैडिसन ग्रैंट और हेनरी फेयरफील्ड ओसबर्न की भी निंदा की. इन दोनों ने ओटा बेंगा के प्रदर्शन में बड़ी भूमिका निभाई थी.

हालांकि, सैंपर ने विलियम होर्नाडे का ज़िक्र नहीं किया जो कि ज़ू के फाउंडिंग डायरेक्टर थे. होर्नाडे ने ओटा बेंगा के पिंजरे में हड्डियां डाल दी थीं ताकि मानवभक्षी होने को दिखाया जा सके और उन्होंने खुलेआम कहा था कि ओटा बेंगा के पास मंकी हाउस में सबसे अच्छा कमरा है.

कुछ लोगों का मानना है कि कंज़र्वेशन सोसाइटी को अब अपनी गलती को सुधारते हुए इस पूरी कहानी की हकीकत को सबसे सामने लाना चाहिए.

यह घटना ज़ूलॉजिकल सोसाइटी को आम लोगों को इतिहास के बारे में शिक्षित करने का मौका दे रही है.

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