राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत का दावा है कि समाज सेवा में दक्षिण भारत के ईसाई मिशनरियों से अधिक हिंदू गुरुओं ने काम किया है.
ये बात उन्होंने जयपुर में अपनी संस्था से जुड़े ग़ैर सरकारी संगठनों के एक सम्मेलन में कही.
भागवत ने कहा, "आम तौर पर, देश के बुद्धिजीवी अपनी सेवा के लिए मिशनरियों का जिक्र करते हैं. लेकिन चार दक्षिणी राज्यों में हिंदू आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवा मिशनरियों द्वारा की जाने वाली सेवा से अधिक है."
सम्मेलन में शामिल हज़ारों लोगों ने तालियों के साथ आरएसएस सरसंघचालक के इस बयान पर अपनी मुहर लगाई. लेकिन मोहन भागवत पुरानी बात कर रहे थे.
हक़ीक़त ये है कि आरएसएस का सामाजिक क्षेत्र में काम मौजूदा दौर में ही शुरू हुआ है. ये प्रयास 1989 में शुरू हुआ जब इसकी सामाजिक सेवा शाखा 'राष्ट्रीय सेवा भारती' का जन्म हुआ.
इस सम्मेलन का आयोजन 7-9 अप्रैल को पिंक सिटी जयपुर की सीमा के बाहर केशव विद्यापीठ के विशाल कैंपस में कराया जा रहा है.
इस कैंपस को हर तरफ़ भगवा रंग के कपड़ों और झंडों से सजाया गया है.
इसका आयोजन सफ़ेद रंग के एक विशाल पंडाल के अंदर कराया जा रहा है ताकि सम्मेलन में शामिल होने वाले हज़ारों वालंटियर्स कड़ी धूप से बच सकें.
पंडाल के एक तरफ़ लाइन से सैकड़ों की संख्या में स्टॉल लगाए गए हैं जो अलग-अलग प्रांतों से लाए सामान बेच रहे हैं.
ये सामान राष्ट्रीय सेवा भारती से संबंधित गैर सरकारी संगठनों की सहायता से बनाए गए हैं.
आयोजकों के अनुसार राष्ट्रीय सेवा भारती (आरएसबी) सैकड़ों गैर सरकारी संगठनों का एक संघ है जो आरएसएस से जुड़ा है.
आयोजकों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आरएसबी आरएसएस से स्वतंत्र रूप से संचालित होता है और इसकी अपनी संगठनात्मक संरचना और नेतृत्व है.
राष्ट्रीय सेवा भारती की स्व-घोषित दृष्टि एक आत्मनिर्भर समाज का निर्माण करना है जो अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सशक्त हो.
लेकिन क्या इसमें इन्हें कामयाबी मिली है, क्योंकि भारत की चीन पर निर्भरता बढ़ती ही जा रही और दोनों देश के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2022 में 129 अरब डॉलर तक पहुंच गया है.
यही सवाल बीबीसी से एक संक्षिप्त बातचीत में आरएसएस के वरिष्ठ नेता सुरेश भैयाजी जोशी से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "आत्मनिर्भर करना ये सब अलग संस्थाएँ काम करती हैं, राष्ट्रीय सेवा भारती संस्थाएँ नहीं करती. सेवा संस्थाएँ ट्रेनिंग दे सकती हैं, एम्पलोयमेंट जेनरेशन नहीं करती."
"हम लोगों को स्किल्स देते हैं जिसके आधार पर वो रोज़गार ढूंढे या रोज़गार करें. सेवा भारती रोज़गार देने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है, उनका काम नहीं है."
इस सम्मेलन का आयोजन एक ऐसे समय में हो रहा है जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले एनजीओ पर नियामक शिकंजा कस दिया है.
सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली ऐसी कई स्वैच्छिक संस्थाओं के पिछले कुछ वर्षों में नियमों के कथित उल्लंघन के लिए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के तहत अपना पंजीकरण रद्द कर दिए गए हैं.
इससे देश के विभिन्न हिस्सों में कई गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों में कमी आई है.
इसपर बीबीसी के एक सवाल पर सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा, "जो एनजीओ ठीक तरह से काम कर रहे हैं सरकार उन्हें बंद नहीं कर सकती. बंद वो होते हैं जिनके बारे में कुछ प्रश्न हैं, जो सकारात्मक काम कर रहा हैं उनके ऊपर कोई आपत्ति नहीं है."
"देश भर से 1000 से अधिक गैर सरकारी संगठन सम्मेलन में आये हैं. स्पेस नहीं सिकुड़ रहा है. लोग काम कर ही रहे हैं. अब सरकार किसको रोकती है वो तो सरकार का प्रश्न है."
सम्मेलन में मौजूद संस्थाएं आरएसएस से जुड़े हैं. सवाल ये है कि समस्या में घिरी वो संस्थाएं हैं जो सरकार से सहमत नहीं हैं.
इस बारे में जोशी कहते हैं, "जो आरएसबी से जुड़ी संस्थाएं हैं उन्हें यहाँ बुलाया गया है. बाक़ी जो आना चाहते हैं तो कोई आपत्ति नहीं है लेकिन उन्हें हमारा अफिलिएशन लेना पड़ेगा. आरएसबी की कुछ शर्तें हैं वो मानना होगा, आरएसबी अपनी शर्तों पर काम कर रहा है."
तीन दिनों तक चलने वाला यह सम्मेलन इतने बड़े पैमाने पर काफ़ी सालों के बाद आयोजित कराया गया है. ये सम्मेलन सामाजिक सेवा क्षेत्र में सक्रिय रूप से अपनी पहुंच बढ़ाने के आरएसएस के नए सिरे से प्रयास को चिह्नित करता है. आरएसबी के अध्यक्ष पन्नालाल भंसाली हैं.
उनका दावा है कि उनकी संस्थाओं ने 43,000 से अधिक सामाजिक सेवा योजनायें शुरू की हैं और देश के 117 ज़िलों में 12,000 से अधिक सेल्फ-हेल्प समूह चल रहे हैं.