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अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जेक सुलिवन ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में अभी हज़ारों अमेरिकी नागरिक फंसे हो सकते हैं.
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अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जेक सुलिवन ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में अभी हज़ारों अमेरिकी नागरिक फंसे हो सकते हैं.
जेक सुलिवन ने न्यूज़ चैनल सीएनएन से कहा कि वो पक्के आंकड़ें नहीं दे सकते हैं लेकिन उन्हें वापस लाए जाने की कोशिशें की जा रही हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि काबुल एयरपोर्ट पर कथित 'इस्लामिक स्टेट' के हमले की ख़तरा असली है.
इस बीच अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि वो अफ़ग़ानिस्तान से अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए 18 नागरिक विमानों का इस्तेमाल करेगा.
ये विमान काबुल के लिए उड़ान नहीं भरेंगे लेकिन अन्य देशों से यात्रियों को लाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाएगा.
अमेरिकी मरीन फ़ोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर किएर्नन याद करते हैं, "हम (अफ़ग़ानिस्तान के) गांवों में जाकर इस बायोमेट्रिक डेटा सिस्टम में लोगों का नाम दर्ज़ करते थे."
उन्होंने बताया, "12 इंच लंबे और छह इंच चौड़े इस उपकरण के जरिए लोगों की उंगलियों के निशान और उनकी रेटिना को स्कैन किया जाता था. इसके जरिए उनकी तस्वीर भी ली जाती थी."
पीटर के लिए बीते कुछ दिन काफी व्यस्त रहे हैं. वो जब अफ़ग़ानिस्तान में काम करते थे तो 12 स्थानीय दुभाषिए उनके मातहत थे. ये स्थानीय लोगों से बातचीत में मदद करते थे. इस रिपोर्ट के लिए जब पीटर से बात की गई, तब उनके सहयोगियों में से कई अफ़ग़ानिस्तान में थे. पीटर उन लोगों को वहां से निकालने की कोशिश में जुटे थे.
दरअसल, अमेरिकी सुरक्षा बलों के साथ काम कर चुके लोगों के लिए अफ़ग़ानिस्तान को जल्दी से जल्दी छोड़ देना, जरूरी हो गया है.
हरदीत सिंह के चेहरे पर मुस्कराहट थी और वो इसे छिपाने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे.
वो मुश्किलों का लंबा रास्ता पार करते हुए रविवार को भारत आए थे. राजधानी दिल्ली के करीब हिंडन एयरबेस पर उतरने के बाद वो मीडिया से बात कर रहे थे.
अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "मुश्किल तो बहुत ज़्यादा थी, अब क्या कह सकते हैं. "
हालांकि, हरदीत ने दावा किया कि वो उन खुशकिस्मतों में ये एक थे जिन्हें तालिबान ने ज़्यादा परेशान नहीं किया.
यदि आप अफ़ग़ानिस्तान में रहे हैं या पिछले 20 सालों में अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति और स्थिति को करीब से देखने की कोशिश की है, तो आप निश्चित रूप से 'अफ़ग़ानिस्तान के बुलडोज़र' को जानते होंगे.
अब यह बुलडोज़र अफ़ग़ानिस्तान का ही नहीं बल्कि 'इस्लामिक अमीरात' का बुलडोज़र भी हो गया है.
ग़ुल आग़ा शेरजई सीआईए के पूर्व एजेंट और वारलॉर्ड हैं. वो कंधार और नंगरहार प्रांत के पूर्व गवर्नर रह चुके हैं.
उन्होंने रविवार को तालिबान के प्रति वफ़ादारी की शपथ ली है. तालिबान का कहना है कि ग़ुल आग़ा शेरजई अब तालिबान सरकार का हिस्सा होंगे.
साल 2001 में जब नेटो बलों का नेतृत्व करते हुए अमेरिका ने तालिबान को खदेड़ने के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर हमला बोला तो ग़ुल आग़ा शेरजई ऐसे पहले वारलॉर्ड थे जिन्होंने अमेरिका का समर्थन किया.
पूर्वोत्तर भारत के दो राज्य असम और मिज़ोरम के बीच जारी सीमा विवाद थमता हुआ नहीं दिख रहा है. मिज़ोरम सरकार ने रविवार को बताया कि असम पुलिस के जवानों पर 'चोरी' का मामला दर्ज किया गया है.
मिज़ोरम सरकार का दावा है कि असम पुलिस के जवानों ने दोनों राज्यों की सीमा के पास एक प्रोजेक्ट साइट से निर्माण सामाग्री चोरी की है.
कोलासिब के डिप्टी कमिश्नर एच ललथलांगलियाना ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि असम पुलिस के जवान मिज़ोरम के क्षेत्र में कोलासिब ज़िले के बाइराबी शहर के पास ज़ोफाई आए और वहां से उन्होंने एक निर्माणाधीन पुल के पास से निर्माण संबंधी सामाग्री जिसमें लोहे की छड़े शामिल थीं, कथित रूप से चुरा लीं.
उन्होंने बताया कि ये घटना शुक्रवार की है. घटना के वक़्त मुख्य मार्ग को मिज़ोरम के पहले मुख्यमंत्री सी छुंगा के धान के खेत से जोड़ने वाले एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा था. ये इलाका असम के हैलाकांडी ज़िले से लगता है.
डिप्टी कमिश्नर ने बताया कि ब्रिज का कंस्ट्रक्शन एक सरकारी परियोजना है. "इस घटना को लेकर बैराबी पुलिस स्टेशन में असम पुलिस के ख़िलाफ़ निर्माण संबंधी सामाग्री चुराने का एक मामला दर्ज किया गया है."
डिप्टी कमिश्नर एच ललथलांगलियाना ने इस सिलसिले में हैलाकांडी के डिप्टी कमिश्नर को शनिवार को एक चिट्ठी भी लिखी है. चिट्ठी में उनसे इस मामले में ज़रूरी कदम उठाने की अपील की गई है.
चिट्ठी में डिप्टी कमिश्नर एच ललथलांगलियाना ने लिखा है कि ब्रिज के निर्माण प्रोजेक्ट को दोनों राज्यों के सीमा विवाद से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.
ब्रिज का ये प्रोजेक्ट मिज़ोरम की सीमा के भीतर एक सड़क को जोड़ने के लिए किया जा रहा है.
उन्होंने लिखा है, "हालांकि किसी सरकारी कर्मचारी का कोई ऐसा काम करना जिसकी व्याख्या सरकारी संपत्ति की चोरी के रूप में की जा सकती है, बहुत निराशाजनक और गंभीर मुद्दा है."
बैराबी का ज़ोफाई क्षेत्र मिज़ोरम और असम के बीच जारी सीमा विवाद के प्रमुख केंद्रों में से एक रहा है.
मार्च, 2018 में मिज़ोरम के छात्र संगठन मिज़ो ज़िरलाई पॉव्ल के कुछ लोगों ने जब इस क्षेत्र में लकड़ी का विश्राम स्थल बनाने की कोशिश की थी तो यहां हिंसा भड़क गई थी.
इसके बाद असम पुलिस के कथित लाठी चार्ज में 60 से ज़्यादा लोग जिनमें मिज़ोरम के सात पत्रकार भी थे, घायल हो गए थे.
मिज़ोरम के तीन ज़िलों एज़वाल, कोलासिब और मामित की 164.6 किलोमीटर लंबी सीमा असम के हैलाकांडी, चाचर और करीमगंज ज़िलों से लगती है.
नेटो के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया है कि पिछले रविवार को काबुल पर तालिबान के नियंत्रण करने के बाद से हवाई अड्डे और उसके आसपास कम से कम 20 लोग मारे गए हैं.
अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "काबुल हवाई अड्डे के बाहर हालात ख़राब हैं. हमारा ध्यान सभी विदेशियों को जल्द से जल्द देश से बाहर निकालने पर है."
उन्होंने कहा, "तालिबान के साथ किसी भी तरह की झड़प से बचने के लिए हमारे बल काबुल हवाई अड्डे के बाहरी इलाके से दूरी बनाए हुए हैं."
ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने पहले ये बताया था कि हवाई अड्डे के बाहर सात अफ़ग़ान नागरिक मारे गए थे, लेकिन अधिक विवरण नहीं दिया.
ब्रिटिश रक्षा उप सचिव ने घोषणा की थी कि निकासी प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है.
शिवसेना के सांसद संजय राउत ने भारत के बंटवारे की तुलना अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा स्थिति करते से हुए कहा है कि ये एक देश के अस्तित्व और संप्रभुता की बर्बादी को लेकर लोगों की तकलीफ़ों की याद दिलाता है.
शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में छपने वाले अपने साप्ताहिक कॉलम में संजय राउत ने लिखा है कि "अगर नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी के बजाय जिन्ना, जो पाकिस्तान बनने के लिए जिम्मेदार थे, की हत्या की होती तो बंटवारे को टाला जा सकता था और 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती."
उन्होंने कहा कि बंटवारे का दर्द तभी कम किया जा सकता है जब टूटे हुए हिस्से को वापस जोड़ लिया जाए. तब तक मन को शांति नहीं मिलेगी.
"भले ही हम ये महसूस करें कि 'अखंड हिंदुस्तान' होना चाहिए लेकिन ये होता हुआ नहीं दिखता. लेकिन उम्मीद हमेशा बनी रहती है. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक 'अखंड हिंदुस्तान' चाहते हैं तो उनका स्वागत है. लेकिन उन्हें इस बारे में भी सोचना चाहिए कि पाकिस्तान के 11 करोड़ मुसलमानों के बारे में उनकी क्या योजना है."
संजय राउत ने इस मुद्दे पर मराठी लेखक नरहर कुरुंदकर का जिक्र करते हुए कहा कि 'अखंड हिंदुस्तान' के पैरोकारों ने मुस्लिम लीग और द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को अपना लिया था.
राउत ने कहा कि जब अंग्रेज़ों ने मुस्लिम निर्वाचकों की पृथक व्यवस्था शुरू की थी तो महात्मा गांधी सक्रिय राजनीति में नहीं थे. देश को आज़ादी मिलने पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम निर्वाचकों की पृथक व्यवस्था को समाप्त किया और उन्हें दी जा रही विशेष रियायतें बंद कीं.
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पिछली सरकार में मंत्री रहे श्यामाप्रसाद मुखर्जी को कथित वित्तीय अनियमितता के एक मामले में रविवार को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.
श्यामाप्रसाद मुखर्जी इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ उन पर तकरीबन दस करोड़ के एक कथित घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया गया है.
एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि बिष्णुपुर से विधायक रहे श्यामाप्रसाद मुखर्जी जब साल 2020 में स्थानीय नगर निकाय के अध्यक्ष थे, ये तभी का मामला है. उन पर टेंडर की प्रक्रिया में पैसे के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया है. जांच के बाद उनकी गिरफ्तारी की गई है.
बांकुरा के एसपी धृतिमान सरकार ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि "बिष्णुपुर के एसडीपीओ ने इस मामले की जांच की थी. श्यामाप्रसाद मुखर्जी इस मामले से जुड़े सवालों का संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे. इसके बाद उन्हे गिरफ़्तार किया गया."
बीजेपी की बिष्णुपुर ज़िला इकाई के अध्यक्ष सुजीत अगस्थी ने दावा किया कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी भाजपा में चुनावों के पहले शामिल हुए थे लेकिन वे पार्टी गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़े हुए नहीं थे.
बीजेपी नेता ने इस मामले पर सवाल पूछते हुए कहा, "श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर लगाए गए आरोप उस समय के हैं, जब वे तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा था. क्या सरकार अब जाकर जागी है?"
कोरोना वायरस से प्राकृतिक रूप से संक्रमित होना और वैक्सीन लेना आपके इम्यून सिस्टम के लिए दो अलग अलग चीज़ें हैं. दोनों में से कौन अच्छा है?
एक साल पहले भी जब पहली बार कोविड होना घातक था, ख़ास कर बुज़ुर्गों के लिए या उन्हें जिनका स्वास्थ्य पहले से ही ख़राब रहा हो तब भी इस सवाल पर लोगों के मत अलग-अलग ही थे.
अब हम ज़ीरो इम्युनिटी से शुरू नहीं कर रहे हैं क्योंकि अधिकांश लोगों ने या तो पहला टीका लगवा लिया है या फिर इस वायरस से वो पहले ही संक्रमित हो चुके हैं.
आज एक गंभीर सवाल ये है कि क्या बच्चों को भी वैक्सीन दी जानी चाहिए. और क्या हम वयस्कों में इम्युनिटी बढ़ाने के लिए वायरस या बूस्टर डोज़ का उपयोग किया जाना चाहिए.
दोनों विवादास्पद मुद्दे बन गए हैं.
उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान विरोधी समूह का कहना है कि वो तालिबान के साथ बातचीत करने को तैयार हैं. लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वे लंबे समय तक विरोध करने के लिए भी तैयार हैं.
नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट के एक प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि अहमद शाह मसूद के बेटे और राजनेता अहमद मसूद ने काबुल के उत्तर-पूर्व में पंजशीर घाटी में लगभग 9,000 लड़ाके जमा किए हैं.
एक अलग साक्षात्कार में अहमद मसूद ने एक अख़बार को बताया कि उनका आंदोलन बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन 'आख़िरी व्यक्ति का बचाव करने के लिए भी तैयार हैं.'
उन्होंने कहा, "हम राजनीतिक बातचीत के जरिए तालिबान के साथ एक व्यापक सरकार बनाने को तैयार हैं. लेकिन जो चीज हमारे लिए अस्वीकार्य है, वह है चरमपंथी किरदार वाली अफ़ग़ान सरकार का गठन. ये न केवल अफ़ग़ानिस्तान के लिए बल्कि क्षेत्र और दुनिया के लिए भी एक गंभीर खतरा होगा."
इससे पहले बीबीसी फ़ारसी से बात करते हुए तालिबान के प्रवक्ता मोहम्मद नईम ने कहा, "हम ताक़त या बातचीत के माध्यम से पंजशीर मुद्दे को हल करेंगे."
अमेरिका और यूरोपीय देश बीते हफ्ते जब काबुल से अपने नागरिकों और अफ़ग़ान सहयोगियों को निकालने के लिए परेशान दिख रहे थे, तब रूस उन चुनिंदा देशों में से एक था, जो अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े से ज़रा भी चिंतित नहीं था.
रूसी राजनयिकों ने काबुल में तालिबान को "सामान्य लोग" बताया और कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी अब पहले सेअधिक सुरक्षित हो गई है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को कहा कि अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा एक हक़ीक़त है और रूस को इसके साथ ही चलना है.
यह स्थिति 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में नौ साल चले उस विनाशकारी युद्ध से बहुत अलग है, जब रूस काबुल की कम्युनिस्ट सरकार को खड़ा करने की कोशिश में जुटा था.
महिलाओं को पर्दा नहीं करना चाहिए और पुरुषों को एक से अधिक शादी नहीं करनी चाहिए. ये उस महिला के विचार थे जो अफ़ग़ानिस्तान की रानी बनी.
अमानुल्ला ख़ान ने 1919 में जब अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता संभाली तो उनकी पत्नी सोराया तार्ज़ी के विचारों ने लोगों का ध्यान खींचा. सदियों से क़बीलाई और रूढ़िवादी संस्कृति में रहते आ रहे देश के लिए ये विचार नए थे.
कुछ साल बाद अमानुल्ला ख़ान ने अपनी पदवी बदलकर अमीर से बादशाह कर ली और वो अफ़ग़ानिस्तान के शाह हो गए.
अमानुल्ला का शासन 1929 तक चला. इस दौरान वो और रानी सोराया अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे.
1926 में अमानुल्ला ख़ान ने एक बयान में कहा था, 'मैं भले ही जनता का राजा हूं लेकिन शिक्षा मंत्री मेरी पत्नी ही है.'
तालिबान के प्रवक्ता मुहम्मद नईम ने बीबीसी फ़ारसी को बताया कि "हम ताक़त या बातचीत के ज़रिए पंजशीर मुद्दे को सुलझा लेंगे."
ग़ौरतलब है कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के उत्तर में पंजशीर घाटी तालिबान की विरोधी ताक़तों का अंतिम प्रमुख गढ़ है.
काबुल के उत्तर में हिंदुकुश की पहाड़ियां पंजशीर घाटी लंबे समय से तालिबान के प्रतिरोध के केंद्र के रूप में जानी जाती रही है.
विश्लेषकों का कहना है कि अगर तालिबान पंजशीर पर हमला करता है, तो वहां जमा सशस्त्र गुट उनसे लड़ेंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जनसामान्य के विश्वास का प्रतीक थे.
उन्होंने कहा, "हम सबके लिए ये शोक की घड़ी है. कल्याण सिंह जी के माता-पिता ने उनका नाम कल्याण सिंह रखा था, उन्होंने जीवन ऐेसे जिया, उनके माता-पिता ने जो नाम उन्हें दिया था, उन्होंने उस नाम को सार्थक किया. वो जीवन भर जनकल्याण के लिए जिए."
"उन्होंने जनकल्याण को ही अपना जीवनमंत्र बनाया और भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनसंघ, पूरे परिवार को एक विचार के लिए, देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने समर्पित किया. कल्याण सिंह जी भारत के कोने-कोने में एक विश्वास का नाम बन गए थे."
"एक प्रतिबद्ध निर्णयकर्ता का नाम बन चुके थे और जीवन के अधिकतम समय वे जनकल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नरत रहे. उनको जब भी जो दायित्व मिला, चाहे वो विधायक के रूप में हो, चाहे सरकार में उनका स्थान हो, चाहे गवर्नर की जिम्मेवारी हो, हमेशा हरेक के लिए प्रेरणा का केंद्र बने. जनसामान्य के विश्वास का प्रतीक बने."
"देश ने एक मूल्यवान शख्सियत, एक सामर्थ्यवान नेता खोया है. हम उनकी भरपाई के लिए उनके आदर्शों, उनके संकल्पों के लिए अधिकतम पुरुषार्थ करें. और उनके सपनों को पूरा करने में कोई कमी न रखें. मैं भगवान श्रीराम से प्रार्थना करता हूं कि प्रभु राम उन्हें अपने चरणों में स्थान दें."
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की कड़ी आलोचना की है.
उन्होंने इसे ग़ैरवाजिब कदम बताया है. उन्होंने कहा कि गठबंधन सेना की वापसी से जिहादी गुटों की हिम्मत बढ़ेगी.
उन्होंने ये भी कहा कि रूस, चीन और ईरान हालात का फ़ायदा उठाएंगे.
टोनी ब्लेयर ने गठबंधन सेना की वापसी को अफ़सोसजनक, खतरनाक और ग़ैरज़रूरी बताया है.
बीस साल पहले जब टोनी ब्लेयर के प्रधानमंत्रित्वकाल में ही ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी फौज भेजी थी.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी काबुल से सेना वापस बुलाने के बाइडन प्रशासन के फ़ैसले की आलोचना की है.
अलबामा की एक रैली में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने इस कार्रवाई को "अब तक की सबसे बड़ी सैनिक हार करार दिया है."
लेकिन ट्रंप ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए तालिबान के साथ समझौता किया था जिसका नतीजा अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का फ़ैसला है.
ये काबुल में यूनिवर्सिटी के छात्रों के नए सत्र के लिए तैयार होने का वक़्त है. लेकिन जब से तालिबान लड़ाके यहां सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं, कई छात्र अपने अब तक के जीवन के सबूतों को नष्ट करने में लगे हैं.
ये महिला छात्र सताए गए उस हज़ारा अल्पसंख्यक समुदाय की सदस्य हैं जिसे हाल के वर्षों में तालिबान के हाथों अपहरण और हत्याओं का सामना करना पड़ा है. इन्होंने बीबीसी से बात की.
वो बीबीसी को बताती हैं कि कैसे वो सपने बुन रही थीं लेकिन अब उनके लिए वो डर में बदल गए हैं. कुछ दिनों में उनके अस्तित्व का भविष्य तय हो जाएगा.
उन्होंने जो कुछ बीबीसी से कहा... पढ़िए उनकीज़ुबानी.
ये कुछ ऐसा है जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती. वो सब कुछ जिसके मैंने सपने देखे थे, वो सब जिसके लिए मैंने कभी काम किया था. मेरी गरिमा, मेरा अभिमान, यहां तक कि एक लड़की के रूप में मेरा अस्तित्व, मेरा जीवन- सब ख़तरे में है.
गुजरात के डांग ज़िले की ये महिलाएं बांस से राखी बनाती हैं. ये महिलाएं कोटवालिया समुदाय से आती हैं.
इस समुदाय के लोग बांस की टोकरियां और अन्य सामान बनाते हैं. बांस से बनी राखी की कीमत 50-200 रुपये के बीच बैठती है.
पिछले कुछ सालों से बांस से बने सामान की डिमांड नीचे जा रही थी. लेकिन बांस से बनी राखियों ने इस समुदाय को नई ऊर्जा दी है.
अब इन्हें रोज़ी रोटी कमाने का नया ज़रिया मिल गया है.
अगर आपको लगता है कि आप बहुत ज्यादा काम करते हैं और अपने बिज़ी शिड्यूल में से आप खेलकूद के लिए वक़्त नहीं निकाल पा रहे हैं?
अगर ऐसा है तो आपको सुहास यतिराज से मिलना चाहिए.
वो नोएडा में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट हैं और साथ ही उन्होंने टोक्यो पैरालंपिक के लिए भी क्वालिफाई किया है,.