भारत में कोरोना वायरस की स्थिति पर नज़र रखने वाली संस्था आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च) के निदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने कहा है कि जिन ज़िलों में कोरोना वायरस संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं उन ज़िलों में और डेढ़ से दो महीनों के लिए लॉकडउन लगाया जाना चाहिए.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार एक इंटरव्यू के दौरान डॉक्टर बलराम भार्गव ने कहा जिन ज़िलों में संक्रमण की दर 10 फीसदी से अधिक है उन ज़िलों में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए अधिक पाबंदियां लगाने की ज़रूरत है.
फिलहाल देश में ऐसे 718 ज़िले हैं जहां कोरोना टेस्ट में पॉज़िटिविटी दर 10 फीसदी से ज़्यादा दर्ज की गई है. इनमें दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू जैसे बड़े शहर शामिल हैं.
माना जा रहा है कि डॉक्टर बलराम भार्गव की ये टिप्पणी किसी आला सरकारी अधिकारी की पहली ऐसी टिप्पणी है जो कोरोना संकट के दौर से निकलने के लिए लॉकडाउन की मियाद बढ़ाने का समर्थन करती है.
बीते साल लगाए लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था को हुए नुक़सान के बाद मोदी सरकार देशव्यापी लॉकडाउन नहीं लगाना चाहती और केंद्र सरकार ने ये फ़ैसला राज्य सरकारों पर छोड़ दिया था.
कोरोना पर लगाम कसने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों में अपने स्तर पर लॉकडाउन लगाया है और नियम जारी किए हैं. हर सप्ताह-दस दिन में इन नियमों की समीक्षा कर पाबंदियों को सप्ताह भर के लिए या फिर पंद्रह दिनों के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है.
डॉक्टर भार्गव ने कहा, "जिन ज़िलों में कोरोना पॉज़िटिविटी दर अधिक है वहां पूरी तरह तालाबंदी होनी चाहिए. जिन ज़िलों में पॉज़िटिविटी दर पांच से दस फीसदी तक पहुंच गई है वहां राहत दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए इस दर तक पहुंचना होगा. और साफ़ तौर पर आने वाले छह से आठ सप्ताह के भीतर ऐसा होता नहीं दिखता."
राजधानी दिल्ली का ज़िक्र करते हुए डॉक्टर भार्गव ने कहा, "अगर दिल्ली में आज पाबंदियों में राहत दे दी गई तो यहां तबाही आ जाएगी."
दिल्ली में पॉज़िटिविटी दर 35 फीसदी तक पहुंच गई है लकिन अब ये 17 फीसदी तक नीचे आ गई है.
भारत कोरोना महामारी की दूसरी लहर का सामना कर रहा है. यहां रोज़ाना कोरोना संक्रमण के साढ़े तीन लाख से अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं जबकि क़रीब चार हज़ार मौतें हो रही हैं. हालांकि जानकारों का कहना है कि असल आंकड़े इससे करीब 10 गुना अधिक हैं.
यहां के अस्पताल और शवगृह मरीज़ों और शवों से भरे पड़े हैं, स्वास्थ्यकर्मी बुरी तरह थके हुए हैं और प्रदेश में मेडिकल ऑक्सीजन और दवाओं की कमी है.
देश में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच धार्मिक आयोजनों और चुनावी रैलियों में कोविड-19 से जुड़े दिशानिर्देशों का पालन न करने को लेकर राजनीतिक आयोजनों की मीडिया में आलोचना की गई है.
डॉक्टर भार्गव ने मोदी सरकार की आलोचना तो नहीं की लेकिन उन्होंने कहा कि संकट को देखते हुए इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू करने में देरी हुई.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि 10 फीसदी से अधिक पॉज़िटिविटी दर वाले ज़िलों में पाबंदी लगाने को लेकर देरी हुई, लेकिन बाद में लॉकडाउन लगाया गया."
उन्होंने बताया कि 15 अप्रैल को कोविड-19 के लिए बनी नेशनल टास्क फोर्स की एक बैठक हुई थी जिसमें 10 फीसदी या उससे अधिक पॉज़िटिविटी दर वाले ज़िलों में लॉकडाउन लगाने की सिफारिश की गई थी.
हालांकि इसके बाद 20 अप्रैल टेलीविज़न पर प्रसारित एक संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि लॉकडाउन को "आख़िरी कदम के रूप में" देखा जाना चाहिए और राज्यों का ध्यान "माइक्रो कन्टेनमेन्ट ज़ोन" पर होना चाहिए.
इससे पहले समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इसी महीने कहा था कि नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के प्रमुख ने एक प्राइवेट वर्चुअल कार्यक्रम में कहा था कि देश में अप्रैल की शुरुआत से ही सख़्त लॉकडाउन की ज़रूरत थी.
डॉक्टर भार्गव ने किसी राजनेता की तरफ इशारा तो नहीं किया लेकिन कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के इकट्ठा होने जैसे कार्यक्रम स्वीकार नहीं किए जाने चाहिए.
उन्होंने कहा ये "ये कॉमन सेन्स है."