अज़रबैजान आर्मीनिया संघर्ष का 29वां दिन: फिर छिड़ी घमासान लड़ाई

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नागोर्नो-काराबाख़ में कब्ज़े को लेकर अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच रविवार को एक बार फिर भीषण लड़ाई छिड़ गई है.
इससे पहले दोनों देशों ने एक-दूसरे पर इस विवाद के शांतिपूर्ण समाधान में अड़ंगा डालने का आरोप लगाया था.
आर्मीनिया ने अज़ेरी सेना पर नागरिक इलाकों पर बमबारी करने का आरोप लगाया है.
वहीं अज़रबैजान ने आम लोगों को मारने के आरोप से इनकार किया है और कहा है कि वह संघर्ष विराम लागू करने के लिए राज़ी है, लेकिन इसके लिए पहले आर्मीनियाई सेनाओं को युद्धस्थल छोड़कर जाना होगा.
नागोर्नो-काराबाख को लेकर अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच 27 सितंबर से युद्ध चल रहा है.

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस इलाक़े का अज़रबैजान का कब्ज़ा माना जाता है, लेकिन यहां बड़ी संख्या में आर्मीनियाई मूल के लोग रहते हैं.
इस हफ्ते के अंत में लड़ाई ऐसे वक्त शुरू हुई है जब अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने शुक्रवार को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के साथ युद्धविराम के लिए बातचीत की.
इस युद्ध में दो बार रूस की मध्यस्थता से संघर्षविराम की कोशिशें जा चुकी हैं, लेकिन दोनों ही बार संघर्षविराम टिक नहीं पाया और फिर से लड़ाई छिड़ गई.
नागोर्नो-काराबाख़ के स्थानीय अधिकारियों ने अज़ेरी सेना पर आस्केरन और मार्टुनी के इलाकों में बस्तियों पर आर्टिलरी फायरिंग करने का आरोप लगाया है.
वहीं अज़रबैजान ने आरोप लगाया है कि उसकी पोजिशंस पर छोटे हथियारों, मोर्टार, टैंकों और होवित्जर्स से हमला किया गया है.

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अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने कहा है, "मुझे शांति वार्ता के प्रभावी होने पर पूरा भरोसा है, लेकिन यह बात आर्मीनियाई पक्ष पर भी निर्भर करता है."
फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "अज़रबैजान और आर्मीनिया के लोग जॉर्जिया, रूस, यूक्रेन और अन्य देशों में साथ रह सकते हैं, लेकिन नागोर्नो-काराबाख में साथ क्यों नहीं रह सकते हैं?"
आर्मीनियाई राष्ट्रपति आर्मेन सर्किसियान ने अज़रबैजान पर "आक्रामक और विध्वंसक" होने का आरोप लगाया है.
इस विवाद के चलते तुर्की और उसके नैटो सहयोगियों के बीच रिश्तों में तनाव बढ़ गया है. माइक पोम्पियो ने तुर्की पर अज़ेरी सेना को हथियार दे कर संघर्ष को हवा देने का आरोप लगाया है. तुर्की ने इन आरोपों को खारिज किया है.
शुक्रवार की बातचीत के पहले पोम्पियो ने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि इस विवाद को हल करने का कोई रास्ता निकल आएगा.
संघर्ष विराम की अपील
सर्किसियान ने वैश्विक ताकतों से संघर्षविराम के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की है. उन्होंने कहा, "नागोर्नो-काराबाख़ विवाद के संदर्भ में रूस दोनों पक्षों के बीच एक भरोसेमंद और सक्रिय मध्यस्थ है. रूस का इसमें एक अहम रोल है."
अलीयेव ने कहा है कि आर्मीनिया का रूस से सैन्य समर्थन की मांग करना ख़तरनाक कदम है और किसी तीसरे पक्ष को इस मामले में सैन्य रूप से शामिल नहीं होना चाहिए.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि अमरीका इस विवाद का हल निकालने में रूस की मदद करेगा.
नागोर्नो-काराबाख़ के रक्षा मंत्रालय ने शनिवार को कहा है कि इस जंग में मरने वाले आर्मीनियाई लोगों की संख्या 36 से बढ़कर 963 हो गई है.
अज़रबैजान ने कहा है कि अब तक लड़ाई में उसके 65 आम नागरिक मारे गए हैं और 298 जख्मी हैं. लेकिन, अज़रबैजान ने मारे गए अपने सैनिकों के बारे में कुछ नहीं कहा है.

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अमरीका ने दी अपने नागरिकों को चेतावनी
अज़रबैजान में रहने वाले अपने नागरिकों को अमरीका ने चेतावनी दी है कि उन्हें निशाना बनाया जा सकता है.
अमरीका ने शनिवार को कहा कि नागोर्नो-काराबाख़ में हो रही लड़ाई के बीच अज़रबैजान में रहने वाले अमरीकियों को हमलावर और अपहरणकर्ता निशाना बना सकते हैं.
अज़रबैजान में मौजूद अमरीकी दूतावास ने ट्विटर पर चेतावनी जारी करते हुए लिखा, "बाकू में मौजूद अमरीकी दूतावास को पुख्ता रिपोर्ट मिली है कि यहां रहने वाले अमरीकी नागरिकों और विदेशी नागरिकों पर संभावित चरमपंथी हमला कर सकते हैं और उन्हें अपहरणकर्ता अगवा कर सकते हैं."
दूतावास ने अपने नागरिकों से सचेत रहने को कहा है और कहा है कि वो भीड़भाड़ वाले इलाक़ों में जाने से बचें.
साथ ही दूतावास ने कहा है कि लोग राजधानी में बने होटलों जैसी जगहों पर जाने से बचें जहां विदेशी अक्सर जाते हैं.
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नागोर्नो-काराबाख़ में कब्ज़े के लिए जंग
इससे पहले तुर्की के अमरीकी दूतावास ने वहां रह रहे अपने नागरिकों के लिए चेतावनी जारी कर कहा था कि उन्हें "पुख्ता जानकारी" मिली है कि इस्तांबुल और आसपास रह रहे अमरीकी नागरिकों पर हमले हो सकते हैं और उनका अपहरण किया जा सकता है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी का कहना है कि ये स्पष्ट नहीं है कि इन दोनों चेतावनियों का आपस में कोई नाता है या नहीं.
इस साल के 27 सितंबर से अज़रबैजान और आर्मीनिया कॉकेशस पहाड़ियों मे बसे नागोर्नो-काराबाख़ में कब्ज़े के लिए जंग के मैदान में हैं. इस मामले में तुर्की अज़रबैजान का समर्थन करता है और मानता है कि नागोर्नो-काराबाख़ पर आर्मीनियाई अलगाववादियों ने कब्ज़ा किया हुआ है.
तुर्की पहले ही आर्मीनिया को नागोर्नो-काराबाख़ से पीछे हटने की चेतावनी दे चुका है.

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तुर्की पर आरोप
शुक्रवार को अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अज़रबैजान और आर्मीनिया के नेताओं से मुलाक़ात की और उनसे "जल्द से जल्द हिंसा ख़त्म करने और आम नागरिकों की जान बचाने" की अपील की.
इस बैठक में आर्मीनिया के विदेश मंत्री ज़ोहराब मिनात्सकान्यान ने ज़ोर दे कर कहा कि अज़रबैजान अपने मित्र तुर्की से हथियार ले रहा है.
इससे पहले आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और राष्ट्रपति आर्मेन सर्किसियान कह चुके हैं कि जंग में तुर्की अज़रबैजान की मदद कर रहा है.
अमरीका ने अब तक यही कहा है कि वो इस जंग में न तो अज़रबैजान का पक्ष लेगा और न ही आर्मीनिया का. लेकिन हाल में एक इंटरव्यू में माइक पोम्पियो ने तुर्की की आलोचना की और कहा कि आर्मीनिया अपना बचाव कर रहा है.
अज़रबैजान और आर्मीनिया दोनों ही एक दूसरे पर आम लोगों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगा रहे हैं.
गुरुवार को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि बीते दो दशकों में पहली बार दोनों देशों के बीच भयंकर हिंसा भड़की है. पुतिन ने कहा कि अब तक इस जंग में क़रीब पांच हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.

नागोर्नो-काराबाख़ के बारे में कुछ बातें
- नागोर्नो काराबाख़ 4,400 वर्ग किलोमीटर यानी 1,700 वर्ग मील का पहाड़ी इलाक़ा है.
- पारंपरिक तौर पर यहां ईसाई आर्मीनियाई और तुर्क मुसलमान रहते हैं.
- सोवियत संघ के विघटन से पहले ये एक स्वायत्त क्षेत्र बन गया था जो अज़रबैजान का हिस्सा था.
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस इलाक़े को अज़रबैजान के हिस्से के रूप में मान्यता दी जाती है, लेकिन यहां की अधिकांश आबादी आर्मीनियाई है.
- आर्मीनिया समेत संयुक्त राष्ट्र का कोई सदस्य किसी स्व-घोषित अधिकारी को मान्यता नहीं देता.
- 1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध में 30 हज़ार से अधिक लोगों की जानें गईं. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया.
- उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया. 1994 में यहाँ युद्धविराम की घोषणा हुई थी, उसके बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है और अक्सर इस क्षेत्र में तनाव पैदा हो जाता है.
- 1994 में यहां युद्धविराम हुआ जिसके बाद से यहां गतिरोध जारी है.
- तुर्की खुल कर अज़रबैजान का समर्थन करता है.
- यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना है.
- इस इलाक़े को लेकर 27 सितंबर 2020 को एक बार फिर आज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच जंग शुरू हो गई.
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