नेपाल में नए नक़्शे पर राजनीतिक रस्साकशी, संसद में नहीं हो सकी चर्चा

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नेपाल में नए नक़्शे को संसद से स्वीकृत कराए जाने की प्रक्रिया फ़िलहाल टलती दिख रही है.
इस नक़्शे में नेपाल की सीमा के भीतर उन जगहों को दिखाया गया था जिन्हें भारत अपना इलाक़ा बताता है.
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, नेपाल की संसद में इस बारे में एक संवैधानिक सुधार पर चर्चा होनी थी मगर उसे टाल दिया गया है.
संसद सचिवालय ने बुधवार को बैठक का वक़्त रखा था और दोपहर दो बजे क़ानून मंत्री शिवमय तुम्बाहाम्पे को प्रस्ताव पेश करना था.
इस नए नक़्शे को पिछले सप्ताह पास किया गया था जिसके बाद 22 मई को संशोधित प्रस्ताव सरकार ने संसद में पेश किया था.
संशोधित प्रस्ताव को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है. सर्वसम्मति से संशोधित प्रस्ताव पास कराने के लिए प्रधानमंत्री केपी ओली ने मंगलवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई थी.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़, मधेशी पार्टियों के नेताओं ने सरकार पर अपनी मांगें इस प्रस्ताव के साथ पास कराने का दबाव डाला था.
एएनआई को जनता समाजबादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर बताया, "हम भी अपनी लंबे समय से चली आ रही मांगों पर ध्यान दिलाना चाहते हैं लेकिन इस पर हमें अभी तक संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया है. इसके बजाय प्रधानमंत्री ओली ने इस मुद्दे को पूरी तरह से लोगों की राष्ट्रीय भावना से जोड़ दिया है."
नेशनल एसेंबली में सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का दो-तिहाई बहुमत है लेकिन उसे संवैधानिक संशोधन पास कराने के लिए निचले सदल में दूसरे दलों के समर्थन की ज़रूरत है क्योंकि उसके पास 10 सीटें कम हैं.
नए नक़्शे पर सरकार का समर्थन करने वाली नेपाली कांग्रेस भी पार्टी के अंदर संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव पर चर्चा चाहती है.
हालांकि, सत्ताधारी पार्टी के ओली और पुष्प कमल दहल ने सभी से आग्रह किया है कि वो राष्ट्रीय क्षेत्र और राजनीतिक मांगों को एक साथ न मिलाएं.

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क्या है मामला?
नेपाल के नए नक़्शे पर भारत ने सख़्त प्रतिक्रिया दी थी और इस क़दम को एकतरफ़ा और ऐतिहासिक तथ्यों से अलग बताया था.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने पिछले सप्ताह कहा, "ऐसे कृत्रिम विस्तारवादी दावों को भारत स्वीकार नहीं करेगा.'
चीन से सटे इस इलाक़े के बारे में नेपाल दावा करता है कि 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुई एक संधि के तहत इस पर उसका अधिकार बनता है.
नेपाल के अनुसार उस संधि के तहत महाकाली नदी पश्चिम में भारत के साथ उसकी सीमा का काम करती है और नदी के पूर्व का इलाक़ा उसके दायरे में आता है.
नेपाल की कैबिनेट ने इसे अपना जायज़ दावा क़रार देते हुए कहा कि महाकाली (शारदा) नदी का स्रोत दरअसल लिम्पियाधुरा ही है जो फ़िलहाल भारत के उत्तराखंड का हिस्सा है.

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भारत ने पहले जारी किया था नक़्शा
छह महीने पहले भारत ने अपना नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया था जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ के रूप में दिखाया गया था.
इस मैप में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को भारत का हिस्सा बताया गया था. नेपाल इन इलाक़ों पर लंबे समय से अपना दावा जताता रहा है.
हाल ही में भारत ने लिपुलेख इलाक़े में एक सड़क का उद्घाटन किया था.
लिपुलेख से होकर ही तिब्बत चीन के मानसरोवर जाने का रास्ता है. इस सड़क के बनाए जाने के बाद नेपाल ने कड़े शब्दों में भारत के क़दम का विरोध किया था.
लिपुलेख वो इलाक़ा है जो चीन, नेपाल और भारत की सीमाओं से लगता है.
उत्तराखंड के धारचूला के पूर्व में महाकाली नदी के किनारे नेपाल का दार्चुला ज़िला पड़ता है.
महाकाली नदी नेपाल-भारत की सीमा के तौर पर भी काम करती है.
नेपाल सरकार का कहना है कि भारत ने उसके लिपुलेख इलाक़े में 22 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया है.
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