कठुआ मामला: कोर्ट ने कहा जाँच टीम के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हो

- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
जम्मू के कठुआ ज़िले की आठ साल की बच्ची के बलात्कार, प्रताड़ना और हत्या का मामला एक बार फिर सुर्ख़ियों में है.
इस बार सेवानिवृत्त पुलिस अधीक्षक रमेश कुमार जाला के नेतृत्व वाली छह सदस्यीय स्पेशल जाँच टीम के व्यवहार को लेकर चर्चा हो रही है.
मंगलवार को जम्मू के चीफ़ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट ने एक आदेश जारी कर जम्मू के पुलिस अधीक्षक से जाँच टीम के सभी छह सदस्यों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कहा है.
राज्य क्राइम ब्रांच की ये जाँच टीम बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में गवाहों को डराने धमकाने या परेशान कर ग़लत बयान देने के सिलसिले में जाँच कर रही थी.
इस जाँच टीम में आर के जाला समेत एएसपी पीरज़ादा नावेद, डीएसपी श्वेतांबरी शर्मा, डीएसपी नासिर हुसैन, सब इंस्पेक्टर इरफ़ान वानी और क्राइम ब्रांच के केवल किशोर शामिल हैं.
जम्मू के पुलिस अधीक्षक तेजिन्दर सिंह ने बताया, "अब तक मुझे कोर्ट के आदेश की कॉपी मिली नहीं है. इस कारण मैं किसी तरह की टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हूं."
कठुआ मामले में तीन मुख्य गवाहों (कठुआ के सचिन शर्मा, मरहीन के नीरज शर्मा और राजपुरा सांबा के साहिल शर्मा) की ओर से वकील अंकुर शर्मा ने कोर्ट में अर्जी दाख़िल की थी.
ये तीनों इस मामले के एक अभियुक्त विशाल जंगोत्रा के साथ रहते थे. जनवरी 2018 में जब कठुआ बलात्कार और हत्या का मामला सामने आया उस वक्त विशाल मेरठ के एक निजी विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे.
जून 10, 2019 में पठानकोट की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने इस मामले में छह दोषियों में से तीन को उम्र क़ैद की सज़ा दी थी.
इस मामले में सातवें अभियुक्त विशाल जंगोत्रा- मुख्य अभियुक्त सांझी राम के बेटे हैं. पर्याप्त सबूतों के अभाव में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था.
चीफ़ ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट प्रेम सागर द्वारा 22 अक्तूबर 2019 में दिए आदेश में कहा गया है कि जम्मू के पक्का डांगा पुलिस स्टेशन में 24 सितंबर को एक शिकायत दर्ज कराई गई. शिकायत में आईपीसी की धारा 194 (किसी को सज़ा दिलाने के लिए सबूतों से छेड़छाड़ करना या फ़र्जी सबूत बनाना) और ज़रूरी क़ानूनी प्रक्रिया के तहत जाँच टीम के सदस्यों के ख़िलाफ़ प्राथमिक दर्ज करने की गुज़ारिश की गई थी.
शाकियतकर्ताओं का आरोप था कि जाँच टीम के सदस्यों ने "अभियुक्त विशाल जंगोत्रा के ख़िलाफ़ बयान देने और फ़र्जी सबूत बनाने" के लिए कठुआ के सचिन शर्मा, मरहीन के नीरज शर्मा और राजपुरा सांबा के साहिल शर्मा को "परेशान या बाध्य" किया.
ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में कहा है, "इस शिकायत में क्राइम ब्रांच के छह सदस्यों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं."
आदेश में कहा गया है कि आदेश में आईपीसी की धारा 156(3) के तहत जम्मू के पुलिस अधीक्षक से कहा गया है कि ज़रूरी क़ानूनी प्रावधानों के अनुसार प्राथमिकी दर्ज कराई जाए और मामले की अगली पेशी यानी सात नवंबर से पहले इस संबंध में रिपोर्ट अदालत में दाख़िल की जाए.
शिकायतकर्ता साहिल शर्मा ने बीबीसी को अपनी आपबीती के बारे में बताया, "जम्मू के अपने दफ्तर में बयान लिखने से पहले जाँच टीम से सदस्य हमें चमड़े की बेल्ट से मारते थे."
वो कहते हैं, "विशाल जंगोत्रा के साथ रहने की हमें बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. जब से ये मामला शुरु हुा है हमें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पा रहा है. मैंने पहले सेमेस्टर की परीक्षा दी थी लेकिन फिर मैं दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा नहीं दे सका. मैंने अपना नाम कटवा लिया और अब मैंने बीए करने के लिए इंदिरा गांधी नेशनल ओपन युनिवर्सिटी में एजडमिशन लिया है."
"मैं आने वाले वक्त में भारतीय सेना में होने वाली भर्तियों के लिए भी तैयारी कर रहा हूं."

इमेज स्रोत, Mohit kandhari/BBC
साहिल कहते हैं कि उनके ज़ेहन में जाँच से जुड़े अनुभव अब भी ताज़ा हैं. उन्होंने कहा, "आर के जाला और पीरज़ादा नावेद समेत जाँच दल के दूसरे सदस्य हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर परेशान करते थे. वो जम्मू के दफ्तर में कॉन्फ्रेंस हॉल में हमसे सवाल करते थे."
"उस पुलिस परिसर में हमारे माता-पिता को भी जाने की इजाज़त नहीं थी. वो हमें पूरा पूरा दिन वहीं रोक लेते थे. जब हमें प्यास और भूख लगती थी तो हम अपने माता पिता को आवाज़ देते थे. वो हमें एक दूसरे के सामने बेल्ट से पीटते थे."
साहिल कहते हैं कि उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जिसके बाद उन्हें आंशिक तौर पर राहत मिली. कोर्ट ने जाँच टीम से कहा कि हमारा बयान हमारे माता पिता की मौजूदगी में लिया जाए.

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साहिल कहते हैं कि इसके बावजूद जाँच टीम के सदस्यों ने हमारे माता पिता को जाँच के दौरान इसमें शामिल होने नहीं दिया.
वकील अंकुर शर्मा कहते हैं, "अदालत ने मेरे मुवक्किलों को हिरासत में टॉर्चर करने, ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से उन्हें रोके रखने, डराने और उनके ख़िलाफ़ फ़र्जी सबूत बनाने और उन्हें जबरन इस मामले में गवाह बनाने के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है."
उन्होंने कहा, "इसके साथ जम्मू के लोगों को लेकर हो रही चर्चा कि इस मामले में वो बलात्कारियों के साथ खड़े थे, वो भी धुल जाएगा."
वो कहते हैं कि अदालत ने ये भी माना है कि इस मामले में स्वतंत्र सीबीआई जाँच की मांग करना न्यायसंगत है.
वो कहते हैं , "ये उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो इस मामले में सीबीआई की जाँच नहीं चाहते. सीबीआई जाँच से इस जघन्य अपराध करने वालों को सज़ा मिलेगी."
वे कहते हैं, "मुझे ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि जम्मू पुलिस अधीक्षक कोर्ट के आदेश न मानें, लेकिन अगर न्याय न मिला तो हमें एक बार फिर कोर्ट के दरवाज़े तक आना होगा. "
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