अफ़ग़ानिस्तान में 2019 का राष्ट्रपति चुनाव: एक नज़रिया

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इमेज कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी
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लंबे इंतज़ार और कई बार टाले जाने के बाद आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं. 2001 में तालिबान की हुकूमत के ख़ात्मे के बाद ये अफ़ग़ानिस्तान में होने वाले चौथे राष्ट्रपति चुनाव हैं, जिसके लिए शनिवार, 28 सितंबर को वोट डाले जाएंगे.

हालांकि, अभी भी अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के बीच ये अनिश्चितता बनी हुई है, कि ये अहम चुनाव तय वक़्त पर होंगे भी या नहीं. लेकिन, अभी जो हालात हैं उनके हिसाब से ये चुनाव होने की संभावना ज़्यादा दिख रही है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 8 सितंबर को तालिबान से बातचीत अचानक ही ख़त्म करने का एलान करने से पहले, अफ़ग़ानिस्तान में बहुत कम ही लोगों को ये उम्मीद थी कि राष्ट्रपति चुनाव होंगे. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी बार-बार इस बात का भरोसा दे रहे थे.

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चुनाव के लिए तय तारीख़ से बस दो हफ़्ते पहले, यानी 14 सितंबर को पत्रकारों से बातचीत में राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के प्रवक्ता सादिक़ सिद्दीक़ी ने चुनाव को तय वक़्त पर कराने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी.

सादिक़ सिद्दीक़ी ने कहा था कि, 'स्थायी शांति के लिए चुनाव कराने ज़रूरी हैं. क्योंकि इन चुनावों से सरकार को मिलने वाली वैधानिकता के बग़ैर स्थायी शांति मुमकिन नहीं है.'

इन चुनावों से ये तय होगा कि अफ़ग़ानिस्तान का अगला राष्ट्रपति कौन होगा. मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी, दोबारा सत्ता में आने के लिए चुनाव मैदान में हैं.

हालांकि, अभी भी देश के एक बड़े हिस्से पर तालिबान का क़ब्ज़ा है. और चूंकि अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा बलों और तालिबानी चरमपंथियों के बीच कमोबेश रोज़ झड़पें होती हैं. तो, ऐसे में राष्ट्रपति के चुनाव खंड-खंड हो चुकी शांति प्रक्रिया से बड़े पेचीदा तरीक़े से जुड़ गए हैं.

अब जबकि अमरीका ने तालिबान से आगे किसी भी तरह की शांति वार्ता से ख़ुद को अलग कर लिया है तो, अब इन चुनावों से हिंसा ग्रस्त अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया का रास्ता भी तय होगा.

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अशरफ़ ग़नी ने 2014 के विवादित राष्ट्रपति चुनावों के बाद देश की सत्ता संभाली थी. उन चुनावों पर बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ीवाड़े और धांधली के आरोप लगे थे.

तब से अब तक अशरफ़ ग़नी राष्ट्रीय एकता सरकार के अगुवा रहे हैं. उनका अपने विरोधियों, जिन में अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी शामिल हैं, के साथ बड़े उठा-पटक वाला गठबंधन रहा है. 2014 के चुनाव में विवाद के बाद अब्दुल्ला अब्दुल्ला को चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव का नया पद बनाकर दिया गया था.

इस बार भी राष्ट्रपति चुनाव से पहले अशरफ़ ग़नी पर फ़र्ज़ी वोटिंग के लिए रास्ता तैयार करने के आरोप लग रहे हैं. साथ ही ग़नी की सरकार को कमज़ोर और अवैधानिक भी कहा जाता रहा है.

ऐसे हालात में अफ़ग़ानिस्तान में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव असल में देश की लोकतांत्रिक सियासी व्यवस्था का भी इम्तिहान हैं. और, देश के स्वतंत्र चुनाव आयोग के लिए भी ये परीक्षा है कि वो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा सकता है या नहीं.

वोटिंग की प्रक्रिया-

अफ़ग़ानिस्तान की जनता दो चरणों के चुनाव से सीधे राष्ट्रपति का चुनाव करती है. अगर इन दो राउंड में किसी एक उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत यानी 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं मिलते हैं. तो, फिर रन ऑफ़ राउंड के तहत फिर से चुनाव कराए जाते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान का 18 साल से ज़्यादा उम्र का हर नागरिक इन चुनावों में वोट डाल सकता है. अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्र चुनाव आयोग के जारी किए हुए आंकड़ों के मुताबिक़, देश की कुल 3.7 करोड़ की आबादी में से 96 लाख लोग (32 प्रतिशत महिलाएं और 68 फ़ीसद पुरुष) ने इन चुनावों में वोट डालने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. 2014 के चुनावों में क़रीब 70 लाख लोगों ने वोट डाला था.

रजिस्टर्ड वोटर देश के 34 सूबों में बनाए गए 4942 मतदान केंद्रों के 29 हज़ार 586 पोलिंग बूथ पर अपने वोट डाल सकेंगे. इन चुनावों में दो प्रमुख संगठन चुनाव प्रक्रिया का संचालन करेंगे. पहला तो देश का स्वतंत्र चुनाव आयोग है.

अफ़ग़ानिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 156 के मुताबिक़, चुनाव आयोग का काम, 'चुनाव कराना और प्रक्रिया की निगरानी करना है.' वहीं, चुनावी प्रक्रिया का शिकायती आयोग यानी ईसीसी, अफ़ग़ानिस्तान के चुनावी क़ानून की धारा 30 के मुताबिक़, चुनाव प्रक्रिया पर उठाए जाने वाले ऐतराज़ों और सवालों का निपटारा करने के लिए ज़िम्मेदार है.

उम्मीदवार-

राष्ट्रपति चुनाव के लिए शुरुआत में 18 लोगों और उनके साथियों ने स्वतंत्र चुनाव आयोग से टिकट लिया था.

हालांकि, तब से अब तक जलमय रसूल ने अशरफ़ ग़नी के पक्ष में अपना पर्चा वापस ले लिया है. जबकि, एक और प्रत्याशी, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हनीफ़ अतमार ने अपने ताक़तवर सहयोगी अता मोहम्मद नूर से मतभेदों के बाद अपना चुनाव प्रचार रोक दिया था. इन दोनों प्रत्याशियों के मैदान से हटने के बाद अब 16 प्रत्याशी मैदान में बचे हैं. इन में से केवल चार को ही गंभीर प्रत्याशी माना जा रहा है.

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव में हर प्रत्याशी को 55 लाख अमरीकी डॉलर या क़रीब 44.2 करोड़ अफ़ग़ानी मुद्रा ख़र्च करने का अधिकार है. चुनावी प्रक्रिया 28 जुलाई को शुरू हुई थी, जो क़रीब दो महीने तक चली.

जैसा कि 2014 में हुआ था, इस बार भी चुनाव मैदान में कोई भी महिला उम्मीदवार नहीं है. और दो उप राष्ट्रपति पदों के लिए केवल तीन उम्मीदवारों ने महिला प्रत्याशियों के नाम का एलान किया है.

राष्ट्रपति पद के इन उम्मीदवारों के पीछे कई ताक़तवर सत्ता के दलाल हैं, सियासी लीडर हैं, सूबाई सियासतदां हैं और पूर्व मुजाहिदीन हैं. ये सभी लोग अपने अपने समर्थन वाले उम्मीदवारों के वोटों के हिस्से पर गहरा असर डालेंगे.

ऐसे ही एक किरदार का नाम है, अब्दुल रशीद दोस्तम. जो उज़्बेक लड़ाका हैं. दोस्तम इस वक़्त देश के पहले उप-राष्ट्रपति हैं. 2014 के चुनाव में अब्दुल ग़नी के पक्ष में वोट जुटाने में दोस्तम ने अहम रोल निभाया था. लेकिन, इस बार के चुनाव में अब्दुल रशीद दोस्तम, अब्दुल्ला अब्दुल्ला की स्थिरता और सबका विकास का वादा करने वाली टीम के साथ हैं.

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मुद्दे-

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर, दोनों पर शांति प्रक्रिया की स्थिरता की रणनीति क्या हो और राष्ट्रीय एकता सरकार के सदस्यों के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप, इस बार अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव के प्रमुख मुद्दे हैं. इन्हीं मुद्दों की अफ़ग़ानी जनता और मीडिया के बीच ज़्यादा चर्चा हो रही है.

शांति-

राष्ट्रपति अब्दुल ग़नी ने कई बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति, स्थायी हो, सम्मानजनक हो और लंबे वक़्त के लिए हो. इस मक़सद के लिए उन्होंने अक्सर अपनी उम्मीदवारी को देश हित में सबसे वैधानिक नेतृत्व के तौर पर पेश किया है.

ग़नी ने अपने दोनों राजनीतिक विरोधियों और तालिबान से अपील की है कि वो लोया जिरगा की 3 मई की सिफ़ारिशों को लागू करे. पांच दिनों की महापंचायत के बाद 3 मई को क़बीलाई लोया जिरगा ने इन सुझावों को लागू करने की सिफ़ारिश की थी.

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लोया जिरगा को संबोधित करते हुए ग़नी ने कहा था कि, 'मैं तालिबान से ये अपील करता हूं कि वो अफ़ग़ानिस्तान के भीतर शांति वार्ता के लिए राज़ी हों. हम घरेलू स्तर पर बातचीत का रास्ता तैयार करने के लिए राज़ी हैं. हम चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान अपनी शांति की मेज़बानी ख़ुद करे.'

लेकिन, तालिबान ने कई बार सरकार से बातचीत का प्रस्ताव ठुकराया है. तालिबान, मौजूदा सरकार को कठपुतली निज़ाम कहता है.

यही वजह है कि अशरफ़ ग़नी अक्सर मुश्किल में पड़ जाते हैं. क्योंकि उन्हें तालिबान के साथ शांति वार्ता के तौर तरीक़ों को लेकर कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा है. वो इसे अपनी ताक़त और साहत का प्रतीक कह कर बचाव करते आए हैं.

दूसरे सभी उम्मीदवारों ने भी शांति प्रक्रिया को लेकर अपना-अपना पक्ष सामने रखा है. इन में से कई प्रत्याशियों ने शांति प्रक्रिया से अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को अलग रखने के लिए अमरीका की आलोचना भी की है. और इन उम्मीदवारों ने इस बात के लिए अशरफ़ ग़नी को भी ज़िम्मेदार ठहराया है.

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भ्रष्टाचार-

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के सहयोग मिशन (यूएनएएमए) ने मई 2019 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कुछ सफलता हासिल की है. फिर भी अफ़ग़ानिस्तान दुनिया के दस सबसे भ्रष्ट देशों में से एक है.

संयुक्त राष्ट्र के दूत तडामिची यामामोतो ने मई में कहा था कि, 'संयुक्त राष्ट्र इस बात के लिए अफ़ग़ानिस्तान की सरकार की तारीफ़ करता है कि उसने इस साल कई संस्थागत सुधारों को शुरू किया है. हम सरकार से और सुधारों की अपील करते हैं. आने वाले चुनाव, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में सीखे गए सबक़ का इम्तिहान होंगे.'

राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और उनके विरोधी अब्दुल्ला अब्दुल्ला, दोनों पर ही चुनाव के दौरान सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं. इसके अलावा दोनों नेताओं पर भ्रष्ट और ताक़तवर क़बीलाई सरदारों को रिझाने की कोशिश का भी इल्ज़ाम है. साथ ही दोनों नेताओं पर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने के भी आरोप हैं.

सुरक्षा और न्याय के टिकट पर चुनाव लड़ रहे मोहम्मद आरिफ़ कियानी ने 15 अगस्त को एरियाना टीवी से बातचीत में कहा था कि, 'राष्ट्रीय एकता सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश बना डाला है. इससे यहां की जनता और हुकूमत के बीच फ़ासला और बढ़ गया है.'

अशरफ़ ग़नी की सरकार को लगातार अवैध और भ्रष्ट कहा जाता रहा है. ख़ास तौर से तब से और भी, जब से ये आरोप लगा है कि अशरफ़ ग़नी ने काबुल बैंक के पूर्व सीईओ ख़लीलुल्हा फ़िरोज़ी से 3 करोड़ अमरीकी डॉलर की रिश्वत ली गई. खलीलुल्लाह इस वक़्त भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हैं.

वहीं, हाल ही में टोलो टीवी ने अब्दुल्ला पर आरोप लगाया था कि उन्होंने विदेश मंत्रालय में हुई नियुक्तियों में धांधली की जांच को रोका था. इस वक़्त सलाहुद्दीन रब्बानी अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री हैं. रब्बानी, राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य कार्यकारी यानी अब्दुल्ल्ला अब्दुल्ला का समर्थन कर रहे हैं.

यहां तक कि चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी दूसरी संस्थाएं भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूती नहीं रही हैं. इस महीने की शुरुआत में भ्रष्टाचार निरोधक आपराधिक न्याय केंद्र की अपीली अदालत ने चुनाव आयोग के सात पूर्व अधिकारियों को सज़ा सुनाई थी.

इन में चुनाव आयोग के पूर्व प्रमुख गुला जान अब्दुल बानी सैयद और चुनाव शिकायत आयोग के तीन पूर्व अधिकारी शामिल थे. इन पर पिछले साल हुए संसदीय चुनावों में उम्मीदवारों के वोट घटाने के इल्ज़ाम लगे थे, जो सही पाए गए. इस साल फ़रवरी में राष्ट्रपति अब्दुल ग़नी ने चुनाव क़ानून में संशोधन कर के चुनाव आयोग के सभी सदस्यों को बर्ख़ास्त कर दिया था.

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अर्थव्यवस्था-सुरक्षा की चुनौतियां और राजनीतिक अस्थिरता के अलावा भयंकर सूखे की वजह से अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बहुत नकारात्मक असर पड़ा है. विश्व बैंक की जुलाई 2019 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ 2018 में अफ़ग़ानिस्तान की विकास दर महज़ 2 प्रतिशत रही थी.

हालांकि विश्व बैंक ने अनुमान जताया है कि 2019 में अफ़ग़ानिस्तान की विकास दर बढ़कर 2.5 प्रतिशत रहेगी. फिर भी रोज़गार के अवसरों की कमी और भयंकर ग़रीबी की वजह से अर्थव्यवस्था का मुद्दा बहुत अहम चुनावी मुद्दा बन गया है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक़ कामकाजी उम्र का हर चौथा अफ़ग़ानी नागरिक बेरोज़गार है. वहीं अफ़ग़ानिस्तान की कुल आबादी के 55 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं.

सरकारी अख़बार इस्लाह ने 14 अगस्त को अपने संपादकीय में लिखा था कि, 'लगातार युद्ध, असुरक्षा, आर्थिक चुनौतियों, भयंकर बेरोज़गारी और ड्रग की लत की वजह से आज अफ़ग़ानिस्तान के युवाओं के लिए हालात बहुत ख़तरनाक हो गए हैं.'

अफ़ग़ानिस्तान के अर्थव्यवस्था मंत्रालय ने लोगों को ये भरोसा देने की कोशिश की है कि अर्थव्यवस्था के विकास के लिए योजनाएं तैयार हैं. लेकिन, राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को अर्थव्यवस्था न सुधार पाने के लिए बार-बार आलोचना का सामना करना पड़ता है.

मसीर नाम के अफ़ग़ानिस्तान के अख़बार ने 18 जून के अपने संपादकीय में लिखा था कि, 'राष्ट्रपति देश के एक करोड़ लोगों के लिए रोज़गार सृजन में नाकाम रहे हैं. इसके विपरीत, हज़ारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है.

राष्ट्रपति ग़नी, अफ़ग़ानिस्तान को एशिया के विकास का चौराहा बनाने में नाकाम रहे हैं. उनकी नाकाम क्षेत्रीय नीति की वजह से आज अफ़ग़ानिस्तान दुश्मनी और जंग का अड्डा बन गई है.'

महिला सशक्तिकरण-

पिछले एक साल में राजनीति और समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी पर काफ़ी चर्चा बढ़ी है. ख़ास तौर से इसलिए भी क्योंकि लोगों को डर था कि महिलाओं के अधिकारों की दिशा में अब तक जो प्रगति हुई है, वो तालिबान से बातचीत की वजह से कहीं गंवा न दी जाए.

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पिछले नौ महीनों में जब अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत चल रही थी. तब बहुत सी महिला हस्तियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से शांति प्रक्रिया की लक्ष्मण रेखा तय करने का अभियान चला रही थीं. उनकी चिंताओं के जवाब में राष्ट्रपति चुनावों के प्रमुख उम्मीदवारों जिन में अशरफ़ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी शामिल हैं, ने वादा किया है कि वो अगर चुनाव जीत गए, तो महिला अधिकारों की रक्षा करेंगे.

अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने इसी साल अगस्त में कहा था कि, 'ये बार बार साबित किया जा चुका है कि बिना महिलाओं के किसी भी देश में न तो सुरक्षा हो सकती है और न ही उस देश का आर्थिक विकास हो सकता है. अगर हम अपने देश को ऐसे हालात से आज़ाद कराना चाहते हैं और देश को बेहतर भविष्य की तरफ़ ले जाना चाहते हैं, तो हमें महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कुछ अहम क़दम उठाने होंगे.'

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अशरफ़ ग़नी के कार्यालय पर हाल ही में यौन शोषण के आरोप लगे थे. लेकिन, ग़नी ने भी बार बार अपनी सरकार के उन क़दमों का ज़िक्र किया है, जो उनके मुताबिक़ महिला सशक्तिकरण के लिए थे. जुलाई में एक भाषण में ग़नी ने कहा था कि महिला सशक्तिकरण के उनकी सरकार के प्रस्तावों की पूरी दुनिया ने तारीफ़ की है.

लेकिन, आबादी के हिसाब से देखें तो, चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी नाम मात्र की है. केवल तीन उम्मीदवारों-अहमद वली मसूद, इब्राहिम अलोकोज़ई और रहमतउल्लाह नबील ने अपने साथी उम्मीदवारों के लिए महिला उम्मीदवारों का चुनाव किया है.

अफ़ग़ानिस्तान के मीडिया में आयी रिपोर्ट पर यक़ीन करें, तो, असुरक्षा के डर से चुनाव में महिलाओं के वोट डालने के लिए बाहर आने पर भी असर पड़ेगा. ख़राब माहौल की वजह से हो सकता है कि 2014 के मुक़ाबले इस बार और भी कम महिलाएं वोट डालें. उस बार कुल 70 लाख मतदाताओं में से महिलाओं की तादाद एक तिहाई ही थी.

28 अगस्त को सरकारी अख़बार इस्लाह ने लिखा कि, 'उम्मीदवार और उनकी टीमें इस बात को लेकर फ़िक्रमंद हैं कि महिलाएं शायद चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा न ले पाएं. और इस तरह वो अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने के हक़ से महरूम रह जाएंगी.'

चुनौतियां-

सुरक्षा को ख़तरा-

6 अगस्त को अपने एक बयान में तालिबान ने लोगों को चुनाव में शामिल न होने की चेतावनी जारी की थी. तालिबान इन चुनावों को एक फ़र्ज़ी प्रक्रिया और तमाशा कहते हैं. तालिबान ने अपने चरमपंथियों को चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने का फ़रमान भी जारी किया था.

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तालिबान ने अपने बयान में कहा था कि, 'मौजूदा चुनावी प्रक्रिया आम जनता को धोखा देने की एक चाल है. क्योंकि सभी को पता है कि चुनाव में फ़ैसला लेने की आख़िरी ताक़त उन्हीं के हाथ में है, जो इस चुनाव के लिए पैसे भी दे रहे हैं और इसका प्रबंधन भी कर रहे हैं. जबकि ये हक़ तो आम आदमी का होना चाहिए.'

तब से लेकर सुरक्षा को चुनौती और बढ़ ही गई है. ख़ास तौर से इसलिए भी क्योंकि तालिबान और अमरीका के बीच शांति वार्ता टूट गई है. अमरीका से बातचीत रुकने की वजह से आज तालिबान के पास खोलने के लिए ज़्यादा पत्ते हैं.

क़रीब एक महीने के दौरान बीबीसी के इकट्ठा किए आंकड़े बताते हैं कि 1 से 31 अगस्त के बीच हर रोज़ क़रीब 74 लोगों की जान गई थी.

इन में से केवल 473 मक़तूल ही आम नागरिक थे. इस वजह से अफ़ग़ानिस्तान में अगस्त महीने में मौत के शिकार होने वाले आम नागरिकों की संख्या सीरिया और यमन के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा थी. हालांकि तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान की सरकार, दोनों ने इस आंकड़े पर सवाल उठाए हैं.

चुनाव अभियान शुरू होने के बाद से अकेले राजधानी काबुल में चार बड़े आतंकवादी हमले हुए हैं. इन में से एक हमले में अशरफ़ ग़नी के साथ चुनाव लड़ रहे अमरुल्लाह सालेह को निशाना बनाया गया था. इस हमले में 30 लोग मारे गए थे. जबकि एक और आतंकी हमले में 60 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

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इस हमले की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी. आज भी कुंदुज़, बग़लान और फ़राह सूबों में तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा बलों के बीच नियमित रूप से संघर्ष की ख़बरें आती रहती हैं. इसका नतीजा ये हुआ है कि पहले जहां चुनाव के लिए 7400 मतदान केंद्र बनाए जाने थे, वहां अब केवल 4942 पोलिंग सेंटर काम करने की उम्मीद है.

मौजूदा खतरों को देखते हुए आतंकवादियों के मंसूबों को नाकाम कर के चुनाव कराना बहुत बड़ी चुनौती है. इन चुनावों को तालिबान और इस्लामिक स्टेट, दोनों ही आतंकी संगठनों के समर्थकों से ख़तरा है. इसीलिए ये चुनाव अफ़ग़ानिस्तान की सरकार और सुरक्षा बल, दोनों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.

सरकार की दख़लंदाज़ी-

अफ़ग़ान सरकार के आलोचकों ने बार-बार राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी पर चुनाव के नतीजे प्रभावित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. इल्ज़ाम है कि अशरफ़ ग़नी चुनाव का फ़ैसला अपने हक़ में लाने के लिए धांधली कर रहे हैं. राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के ऊपर लगे आरोप और संगीन हो गए, जब मई महीन में अफ़ग़ानिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने एक विवादित फ़ैसले में मौजूदा राष्ट्रपति का कार्यकाल चार महीने के लिए बढ़ाने का फ़ैसला सुनाया, ताकि नया राष्ट्रपति चुने जाने तक ग़नी ही राष्ट्रपति बने रहें.

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राष्ट्रपति चुनाव के कई उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि अफ़ग़ानिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से अशरफ़ ग़नी को अपने पद का दुरुपयोग करने का और मौक़ा मिल जाएगा और वो अपने पद और रसूख का चुनाव के नतीजों पर असर डालने का काम करेंगे. ऐसा हुआ तो 2014 की तरह ही इस बार भी नतीजे आएंगे. तब अमरीकी सरकार को राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने के लिए ख़ुद दख़ल देना होगा. ज़ाहिर है अशरफ़ ग़नी ने इन आरोपों का खंडन किया है. वहीं, राष्ट्रपति के कार्यालय ने इन आरोपों को बहुत सामान्य बताया है.

स्वतंत्र चुनाव आयोग की क़ाबिलियत-

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्र चुनाव आयोग ने कई बार मतदाताओं, नेताओं और राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों को भरोसा देने की कोशिश की है कि वो देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने में सक्षम है. लेकिन, पिछले साल हुए संसदीय चुनावों के दौरान चुनाव आयोग के बर्ताव को देखने के बाद कोई उम्मीद नहीं जगती.

अफ़ग़ानिस्तान के संसदीय चुनाव पिछले साल अक्टूबर में हुए थे. इन पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, वोटिंग में धांधली और बायोमेट्रिक मशीनों में गड़बड़ी के आरोप लगे थे. ये मशीनें चुनाव केंद्रों में इसलिए लगाई गई थीं, ताकि कोई भी वोटर दोबारा वोट न डाल सके.

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पिछले साल दिसंबर में अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग की क्षमता पर फिर से सवाल उठे, जब इस ने देश के राष्ट्रपति चुनावों को पहले तो 20 जुलाई और फिर मार्च तक के लिए टाल दिया था. इसके बाद चुनाव आयोग ने वोटिंग के लिए 28 सितंबर की तारीख़ तय की.

अफ़ग़ानिस्तान का चुनाव आयोग उस वक़्त फिर से सुर्ख़ियों में था, जब चुनाव शिकायत आयोग ने काबुल में हुए संसदीय चुनाव के वोट को अवैध करार दिया था. इसके बाद राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने सभी सदस्यों को बर्ख़ास्त कर दिया था.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप

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जब हवा अलाम नूरिस्तानी को अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग का नया अध्यक्ष बनाया गया, तो उन्होंने अक्टूबर में हुए चुनाव को पिछले 15 साल के सबसे ख़राब चुनाव बताया था. साथ ही हवा आलम नूरिस्तानी उस वक़्त ये प्रण लिया था कि अगर सभी प्रत्याशी तैयार हो जाते हैं, तो वो चुनाव कराने के लिए तैयार हैं. बशर्ते सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय, इन चुनावों के लिए ज़रूरी रक़म दे.

अफ़ग़ानिस्तान के सांसद उर्फ़ानुल्लाह उर्फ़ान ने मई महीने में क़हा था कि, 'चुनाव आयोग के लिए बहुत ख़तरनाक हालात पैदा हो रहे हैं. इसके इर्द-गिर्द कुछ लोगों ने घेरा बना लिया है.ऐसे में चुनाव आयोग ईमानदारी पगल्9गऔर निष्पक्षता से काम नहीं कर सकता.'

संसदीय चुनाव में एक अहम मुद्दा उठा था कि बायोमेट्रिक मशीनें अक्सर काम नहीं करतीं. ये ख़बर भी सुर्ख़ियों में है.

अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग के सदस्यों ने ये तो माना है कि जर्मनी से ख़रीदी गई कंपनियां डर्मालोग की मशीनें किसी न किसी वजह से काम नहीं कर रही हैं. वो अक्सर फिंगरप्रिंट को पढ़ने में नाकाम रहती हैं.

हालांकि तब से चुनाव आयोग ये कह चुका है कि उस वक़्त आई समस्या को दूर कर लिया गया है. और अब पोलिंग मशीनों पर नई मशीनें लगाई जा रही है. लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान के चुनाव आयोग ने अपनी छवि सुधारने के लिए कोई भी क़दम नहीं उठाया है.

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