अमरीकी बैन से सलाहुद्दीन और पाकिस्तान पर क्या असर?

सैयद सलाहुद्दीन
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    • Author, असद मुनीर
    • पदनाम, रिटायर्ड ब्रिग्रेडियर, पाकिस्तान आर्मी
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अमरीका ने कश्मीरी चरमपंथी संगठनों के गठबंधन यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के प्रमुख मोहम्मद यूसुफ़ शाह उर्फ़ सैयद सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में डाल दिया है.

सलाहुद्दीन हिज़बुल मुजाहिदीन के नेता हैं और भारत सरकार उन्हें कई चरमपंथी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार मानती है.

अमरीका ने सलाहुद्दीन को अमरीकी सुरक्षा और विदेश के नीति के लिए ख़तरा बताते हुए प्रतिबंध लगाया है. लेकिन इस अमरीकी प्रतिबंध का बहुत असर नहीं होने वाला क्योंकि अदालत में अपराध साबित करना बेहद मुश्किल है.

जमात उद दावा के मुखिया हाफ़िज सईद पर भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान सरकार ने गिरफ़्तार भी किया लेकिन कोर्ट में दो तीन बार मुकदमा चल चुकने के बावजूद, उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं पेश किया जा सका.

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पाकिस्तान पर दबाव

अमरीकी प्रतिबंध के मुकाबले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रतिबंध ज़्यादा प्रभावी होता है क्योंकि इसकी ज़िम्मेदारी संबंधित देश पर डाल दी जाती है.

अगर भारत सरकार भी पाकिस्तान पर दबाव डालता तो हो सकता है कि गिरफ़्तार करने से उन्हें थोड़ा नुकसान होता.

ऐसे प्रतिबंधों से उस व्यक्ति के आर्थिक संबंधों और यात्रा पर असर पड़ता है लेकिन सलाहुद्दीन पर इससे ज़्यादा असर नहीं पड़ने वाला.

ताज़ा बैन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीकी यात्रा के मौके पर एक सकारात्मक संदेश देने के लिए लगाया गया, ज्यादा लगता है.

जहां तक पाकिस्तान की बात है तो वहां की सरकार ये कह सकती है कि उसे ठिकाने के बारे में पता नहीं. हां ये हो सकता है कि देश वो खुले तौर पर नहीं घूम सकते हैं.

सलाहुद्दीन ने पाकिस्तान सरकार को भी एक बार धमकी दी थी.

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भारत को सकारात्मक संदेश

इस बैन से अधिक से अधिक उनकी यात्रा पर पाबंदी लगेगी और आर्थिक नुकसान बहुत कम होने की संभावना है क्योंकि अमरीका में शायद ही उनका कोई बैंक खाता हो या पैसा जमा हो.

लेकन वो काफ़ी सालों से सक्रिय नहीं हैं, उम्र भी काफ़ी हो चुकी है. ऐसे में ये बैन भारत के प्रति सकारात्मक संदेश देने लिए भी लगाया गया हो सकता है.

तालिबान के साथ दूसरा मामला था. उनकी अफ़ग़ानिस्तान में सरकार थी और बाद में वहां अमरीका और अन्य देशों की फौजें मौजूद थी. वहां और बाकी दुनिया में उसका जीना मुश्किल हो गया था.

इसीलिए वो इस सूची से खुद को बाहर निकालने जाने की मांग करते रहे हैं.

लेकिन 9/11 के पहले और बाद के हालात में काफ़ी फ़र्क आ चुका है. पहले पाकिस्तान में कैंप थे, लोगों की यहां ट्रेनिंग होती थी, लोग सरहद पार जाते थे. लेकिन अब ये सब खुले तौर पर नहीं होता.

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खुफ़िया सूचनाओं का आदान प्रदान

और जिस तरह भारत अपने यहां से आने जाने वालों को नियंत्रित नहीं कर सकता, यहां तक कि अमरीका भी मेक्सिको से आने जाने वालों को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसी तरह पाकिस्तान भी नहीं कर सकता है.

ऐसी व्यवस्था अभी तक दुनियाके किसी देश में लागू नहीं हो पाई है. चरमपंथ काबू हल तो तभी निकलेगा जब पड़ोसी मुल्क आपस में रिश्ते बनाकर रखें ताकि खुफ़िया सूचनाओं का आदान प्रदान होता रहे.

भारत पाकिस्तान को ताउम्र एक दूसरे का पड़ोसी बनकर ही रहना है, ऐसे में अगर वो अच्छे रिश्ते बनाकर रहते हैं तो इस मसले पर कोई कारगर हल भी निकाल सकते थे.

जिस तरह चीन ताइवान पर हक़ जताता रहता है लेकिन वो कुछ ज़्यादा कर नहीं सकता इसके सिवा कि वो ख़ुद के इतना मज़बूत होने का इंतज़ार करे ताकि ताइवान ख़ुद ब ख़ुद उसके साथ शामिल हो जाए.

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पाक-अमरीका

भारत पाकिस्तान ने पिछले दशक में रिश्ते सुधारने की कोशिशें की थीं. ये एक सही तरीक़ा था दोनों देशों के बीच तनाव कम करने का.

चरमपंथी संगठनों और उसके नेताओं पर प्रतिबंध लगने से पाकिस्तान और अमरीका के बीच संबंधों पर थोड़ा बहुत तो असर पड़ेगा.

क्योंकि 9/11 के बाद अमरीका ने पाकिस्तान को नैटो में एक गैर सदस्य के तौर पर शामिल कर लिया था, लेकिन बाद में रिश्तों में तनाव भी देखा गया.

राष्ट्रपति चुने जाने के पहले डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि 'पाकिस्तान के ऊपर सबसे बड़ा चेक भारत होगा और अगर भारत मज़बूत होगा तो हम पाकिस्तान से डील कर सकते हैं.'

(बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत पर आधारित.)

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