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शनिवार, 16 मई, 2009 को 11:19 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से

उत्तर प्रदेश में लगा कांग्रेस का 'जैकपॉट'

लोकसभा चुनाव में मिले अप्रत्याशित जनसमर्थन से उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता फूले नहीं समा रहे हैं.

उन्हें जो मिला है वह उनकी उम्मीद से बहुत ज़्यादा है.

लेकिन वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) को अपनी राजनीति पर पुनर्विचार की ज़रुरत महसूस हो रही है.

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ समझौता न हो पाने के बाद कांग्रेस ने वहाँ अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था और वहाँ उसे इस बार 20 से अधिक सीटें मिलती हुई दिख रही हैं.

कांग्रेस की नेता रीता बहुगुणा ने इस जीत पर कहा, "हम 20 प्रतिशत वोट पाने की अपेक्षा कर रहे थे लेकिन जनता ने हमें 26 प्रतिशत वोट दिया है. यह जैकपॉट की तरह है."

इससे पहले 2004 के चुनाव में कांग्रेस को 12 प्रतिशत वोट मिले थे और पार्टी ने नौ सीटों पर जीत हासिल की थी. इस लिहाज से इस बार मतों के प्रतिशत में 14 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

कांग्रेस ने प्रदेश की 80 से 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था.

अब पार्टी के नेता कह रहे हैं कि नतीजे इससे बेहतर हो सकते थे अगर कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला तीन महीने पहले कर लिया होता और यह समय समाजवादी पार्टी से तालमेल करने की बातचीत में न गँवाया होता.

समझा जाता है कि आख़िर में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने समझौते न करने का फ़ैसला किया था.

विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस को ग़रीबों और किसानों के लिए चलाई गई योजनाओं का लाभ मिला है, जिसमें रोज़गार गारंटी योजना और कर्ज़ माफ़ी शामिल है.

पछतावा

उधर मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी को पिछले चुनावों की तुलना में काफ़ी नुक़सान हुआ है.

ऐसा दिखता है कि समाजवादी पार्टी को जो नुक़सान हुआ है उसका फ़ायदा कांग्रेस को ही मिला है. भाजपा और बसपा इसका फ़ायदा नहीं उठा पाई हैं.

अब समाजवादी पार्टी के नेताओं को पछतावा हो रहा है कि अगर उन्होंने कांग्रेस को कुछ और सीटें देना स्वीकार कर लिया होता और समझौता हो जाता तो चुनाव में पार्टी को वैसा नुक़सान नहीं होता जैसा अभी हुआ है.

पार्टी महासचिव अमर सिंह ने कहा है, "अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा होता तो राज्य से बहुजन समाज पार्टी का सूपड़ा साफ़ हो गया होता."

उन्होंने कहा है कि दोनों के अलग-अलग लड़ने से बसपा कमज़ोर तो हुई है लेकिन वह ख़त्म नहीं हुआ है.

अब पार्टी के नेताओं को लग रहा है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में जीत का रास्ता देख लिया है और इससे समाजवादी पार्टी के सामने ख़तरा मंडरा रहा है कि प्रदेश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति का मंच उससे छिन जाए.

मायावती को सबक

लेकिन इन नतीजों से सबसे बड़ा झटका राज्य की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को लगा है.

विधानसभा चुनावों में मिली भारी जीत के बाद वे केंद्र में सरकार बनाने की बात करने लगी थीं और चुनावों से पहले उन्होंने साफ़ कहा था कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं.

लेकिन लोकसभा चुनावों में मायावती की पार्टी का प्रदर्शन वैसा नहीं रहा है जैसाकि 2007 के विधानसभा चुनावों में था.

बसपा की ओर से कोई अधिकृत बयान नहीं आया है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि मायावती की सरकार में पार्टी कार्यकर्ताओं को किनारा कर दिया गया है और नौकरशाही हावी हो गई है और इससे कार्यकर्ता इन चुनावों में घर बैठ गया.

आमलोगों में धारणा है कि मायावती सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है और दो साल पहले सरकार में आने के बाद मायावती सरकार ने जिन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरु की थी बाद में उन्हें ही साथ ले लिया गया.

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि मायावती सरकार ने ग़रीबों के लिए कोई कार्यक्रम नहीं चलाया और पार्टी का ध्यान चंदा वसूली जैसे कार्यक्रम में ही लगा रहा.