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रविवार, 03 मई, 2009 को 14:37 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

राजशाही की चमक के लिए सियासत

राजस्थान के चुनावी अखाड़े में पूर्व राजपरिवारों का जलवा उभार पर है. यहाँ कई प्रमुख पूर्व राजघराने चुनावी मैदान में है. कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी है.

किशनगढ़ के पूर्व राजपरिवार के बृजराज सिंह कहते हैं, "हाल के वर्षों में इन परिवारों के प्रति रुझान बढ़ा है."

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं मानते. जब राजा और रंक का दौर था तो वे राजपूती आन-बान और शान का बखान करते थे.

अब वक़्त बदला तो पूर्व राजघरानों ने जु़बान बदली और वे जनतंत्र और जनसेवा का वास्ता देकर वोट मांग रहे हैं.

बढ़ता रूतबा

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने अलवर, जोधपुर और कोटा की पूर्व रियासतों के सदस्यों को चुनावी मैदान में उतारा है तो भाजपा की सूची में भी ऐसे शाही प्रत्याशियों की कमी नहीं है.

राज्य में भाजपा की कमान सिंधिया परिवार की वसुंधरा राजे के हाथ में है तो उनके पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह एक बार फिर चुने जाने का प्रयास कर रहे है.

जोधपुर के पूर्व शाही परिवार की चंद्रेश कुमारी शादी के बाद अपनी ससुराल हिमाचल प्रदेश में बस गईं थीं. मगर चुनावी राजनीति उन्हें अपने मायके खींच लाई .यहाँ वो कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं.

चंद्रेश कुमारी कहती हैं, "मेरे पिता दिवंगत राजा हनुमंत सिंह का सपना था कि जोधपुर की जनता की ख़िदमत की जाए. उसे पूरा करना चाहती हूँ. मेरे पिता, माँ कृष्णा कुमारी और भाई गज सिंह सांसद रहे हैं."

चंद्रेश कुमारी आगे कहती हैं, "अभी भी हमारे परिवार के लिए लोगों में ज़बरदस्त सम्मान है. जब निकलती हूँ तो लोग कहने लगते हैं, राजमाता जा रही हैं. मैं उन्हें बताती हूँ की मैं तो उनकी बेटी हूँ. बहुत काम करना चाहती हूँ. ख़ास कर शिक्षा और पेयजल के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है."

किशनगढ़ के पूर्व राजघराने के बृजराज सिंह कहते हैं, “हाँ हाल के वर्षों में इन परिवारों के प्रति लोगों में रुझान बढा है. ये अच्छी बात हैं. क्योंकि पूर्व राजघराने हमेशा से ही जनता के लिए अच्छा सोचते रहे हैं."

राजनीति में दख़ल

जयपुर के राजपरिवार की पद्मिनी कहती हैं, "नहीं ऐसा नहीं है, मुझे लगता है पूर्व रियासतों का हमेशा ही राजनीति में दख़ल रहा है. हाँ, अब नई पीढ़ी मैदान में आ गई है."

वो कहती हैं, "इन राजघरानों की अगली पीढ़ी को सियासत में देखकर. इनकी हिमायत करने वाले और आश्रित रहे लोग बेहद ख़ुश हैं."

जयपुर के राजगुरु पंडित सुबोध चंद्र कहते हैं, “इन परिवारों में जनता का नेतृत्व करने के गुण नैसर्गिक हैं और ये ऐसा करने की क्षमता रखते हैं.

आज़ादी के तुंरत बाद राजा-महाराजा, राम राज्य परिषद् और बाद में स्वतंत्र पार्टी के झंडे पर सक्रिय दिखे. लेकिन अब वे देश की दो प्रमुख पार्टियों के मंचो पर सक्रिय हो गए हैं. कई लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री अशोक गहलौत कहते हैं, "भारत को आज़ाद हुए साठ साल हो गए हैं. अब कोई राजा नहीं है. अगर उनकी नई पीढ़ी राजनीति में आती है तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है."

राजनैतिक विश्लेषक डॉ राजीव गुप्ता इससे सहमत नहीं है. उनके अनुसार ये विडंबना ही है कि जिन्हें हाशिये पर होना चाहिए था, वो फिर ताक़त के साथ उठ खडे़ हुए हैं. वे फिर खुलकर राजा-महाराजा और महारनी जैसे संबोधनों के आदी होते नज़र आ रहे हैं. इन पदों और उपाधियों के अख़बारों में विज्ञापन छपने लगे हैं.

आम आदमी जो जाति और धर्म के दायरों को तोड़ नहीं सका था. अब उसे गुज़रे ज़माने के सामंती माहौल का हिस्सा भी बनाया जा रहा है. ये प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं है.

जोधपुर से भाजपा विधायक सूर्यकांत व्यास को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगता. वो पूछती हैं, "अगर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को महारानी कह कर संबोधित किया जाए तो इसमें क्या गलत है."

यूँ तो आज़ाद भारत की सियासत में ना तो कोई राजा है और ना रानी. मगर सियासी फ़लक़ पर ये बात महज़ एक मुहावरा बन कर रह गई है.