गुरुवार, 23 अप्रैल, 2009 को 13:15 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
सालों बाद अयोध्या-फ़ैजाबाद में कांग्रेस की सूखी डालों में मानो कुछ हरियाली दिखाई दे रही है. बाबरी मस्जिद, राम जन्मभूमि विवाद के कारण यहाँ के मुसलामानों ने 1989 के बाद से कांग्रेस से मुँह मोड़ लिया था.
गुरुवार सुबह अंगूरी बाग मतदान केंद्र के बाहर मिले कुछ मुस्लिम मतदाताओं का कहना था कि बाबरी मस्जिद मुद्दे पर उनकी कांगेस से नाराज़गी दूर हो गई है और वे कांग्रेस की तरफ़ वापस लौट आए हैं.
वहीं दूसरा तबक़ा अभी भी अपनी बात पर अड़ा हुआ है. उसका कहना है कि अच्छे हों या बुरे लेकिन उसके पास मुलायम सिंह यादव का कोई विकल्प नहीं है.
उनके मुताबिक़ फ़ैज़ाबाद लोकसभा क्षेत्र से बाक़ी तीन प्रत्याशियों में से एक ने ताला खुलवाकर शिलान्यास कराया, दूसरे ने मस्जिद तोड़ी और तीसरा उम्मीदवार मंदिर के लिए मूर्तियाँ गढ़वा रहा था.
लेकिन मुसलमानों के बीच 'पीस पार्टी' के नाम से एक तीसरा विकल्प भी उभरा है जो कहता है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की तरह मुसलमानों को भी अपनी अलग पार्टी बनानी होगी.
'पीस पार्टी' का गठन दिल्ली की बटला हाउस मुठभेड़ और चरमपंथी होने के आरोप में आज़मगढ़ के मुस्लिम युवाओं कि गिरफ़्तारी की प्रतिक्रिया है.
पढ़े-लिखे और सियासी रुझान वाले मुस्लिम नेता कह रहे हैं कि 'पीस पार्टी' मुस्लिम वोटों का बँटवारा कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को फ़ायदा पहुँचाना चाहती है. ये लोग 'पीस पार्टी' को भाजपा का एजेंट भी बताते हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि 'पीस पार्टी' के आने से भाजपा को फ़ायदा भी मिल रहा है.
पार्टियों की रणनीति
मुस्लिम वोटों के बँटवारे से होने वाले नुक़सान को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) पिछड़ी जातियों को एकजुट करने में लगी है. इससे कहीं भाजपा को तो कहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को नुक़सान होगा.
दलित समाज में भी भीतर ही भीतर हलचल है. दलितों की पहली पसंद अब भी बसपा है लेकिन पुराना बामसेफ़ काडर बहन जी के नए-नए ब्राह्मण और सर्वजन प्रेम के कारण झुंझलाया हुआ है. बामसेफ़ (पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों की महासंघ) के पुराने काडर में दलित नेता कांशीराम के अनेक सहयोगी है.
वहीं पासी और सोनकर समुदाय को लगता है कि बसपा दलितों में एक ही जाति को ज़्यादा महत्व देती है. इसलिए वे कहीं कांग्रेस, कहीं सपा और कहीं भाजपा की ओर तो कहीं-कहीं इंडियन जस्टिस पार्टी (इंजपा) की तरफ़ झुक रहे हैं.
हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में एक तबक़ा ऐसा दिखा जो राष्ट्रीय दलों को बेहतर समझते हैं. इसका फ़ायदा कहीं कांग्रेस को तो कहीं भाजपा को मिला रहा है.
यह फ़ायदा-नुक़सान इस बात पर निर्भर है कि किसका उम्मीदवार और संगठन कैसा है. उदाहरण के लिए फ़ैज़ाबाद और अयोध्या शहर में कांग्रेस के निर्मल खत्री इस बार मुख्य मुक़ाबले में हैं. ढुलमुल मतदाता उनकी तरफ़ जा रहे हैं हालांकि हिंदूवादी मतदाताओं पर लल्लू सिंह कि पकड़ क़ायम है.
बसपा ने आख़िरी क्षणों में यहाँ के राजा अयोध्या विमलेंद्र मोहन को उम्मीदवार बनाया है. वे शहर में लड़ाई को तिकोनी बना रहे हैं. मगर ग़रीब और दलित समुदाय में वे पूरी तरह स्वीकार नहीं हैं.
सपा के मित्रसेन यादव पहले की ही तरह शहर में अब भी कमज़ोर हैं. पिछली बार वे बसपा से जीते थे. ग्रामीण इलाक़ो में अब भी मित्रसेन का पलड़ा भारी बताया जाता है. कह सकते हैं कि शहर में मुख्य लड़ाई कांग्रेस-भजपा में है तो ग्रामीण इलाकों में सपा और बसपा के बीच.
इस चुनाव के ये कुछ ख़ास रंग हैं. कई रंगों के घालमेल से हर आम चुनाव में कोई न कोई नया रंग उभरता है.
इस बार मतदाताओं के रुझान में जो बदलाव आया है. उससे क्या नया रंग बनता है यह 16 मई को ही पता चल पाएगा.
फ़िलहाल केवल इतना ही कह सकते हैं कि कांग्रेस का 'वोट शेयर' यानी मतदान में हिस्सा कुछ बढ़ सकता है. भाजपा की सीटें कुछ बढ़ सकती हैं. लेकिन अधिकतर सीटों का बँटवारा सपा और बसपा में ही होगा. अनेक वर्गों में सत्ता विरोधी भावना के बावजूद बसपा को इस बात का सुकून है कि उसके प्रतिद्वंद्वियों के वोट बंट रहे हैं.