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बुधवार, 22 अप्रैल, 2009 को 12:53 GMT तक के समाचार

अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, जेजूरी, महाराष्ट्र से

मढा और बारामती का चुनावी गणित

महाराष्ट्र के मढा और बारामती लोकसभा क्षेत्रों में चुनावी रंग सिर चढ़कर बोल रहा है. कारण यह है कि मढा से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और बारामती से उनकी बेटी सुप्रिया सुले चुनाव मैदान में हैं.

दोनों सीटों पर चुनाव के दूसरे चरण में 23 अप्रैल को मतदान होना है.

शरद पवार की गिनती प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में होती है. बारामती लोकसभा क्षेत्र का छह बार प्रतिनिधित्व कर चुके शरद पवार को महाराष्ट्र के इन क्षेत्रों में चुनौती देना आसान नहीं है.

शायद उनकी 'लोकप्रियता' का अंदाज़ा इस बात से लग सकता है कि इन इलाक़ों में अनेक लोग उन्हें 'साहब' के नाम से ही संबोधित करते हैं.

उनके विरोधी भी मानते हैं कि बारामती क्षेत्र की गिनती राज्य के उन्नत क्षेत्रों में होती है और इसका श्रेय शरद पवार को जाता है.

हालांकि इस बार शरद पवार बारामती से नहीं बल्कि मढा से चुनाव लड़ रहे हैं जो परिसीमन के बाद बना नया लोकसभा क्षेत्र है और बारामती से उनकी बेटी और राज्यसभा सदस्य सुप्रिया सुले चुनाव मैदान में हैं.

राजनीतिक क़द बनाम सूखा

बारामती की तरह ही मराठा और पिछड़ा वर्ग की बहुसंख्या वाला मढा क्षेत्र ऐसा है जहाँ शरद पवार ख़ुद चुनाव प्रचार में ज़्यादा भाग लेने की ज़रूरत नहीं समझते. उनके समर्थक बताते हैं कि इसकी वजह यह है कि उन्हें वहाँ से जीत हासिल करने का विश्वास है.

उनके अलावा पंद्रह उम्मीदवार मैदान में हैं पर उनका सीधा मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सुभाष देशमुख से है. देशमुख पिछली बार सोलापुर सीट से जीते थे लेकिन परिसीमन के बाद मढा से खड़े हैं.

राजनीतिक क़द के हिसाब से देशमुख की तुलना बेशक़ शरद पवार से नहीं की जा सकती. लेकिन पिछले कुछ सालों से मढा में लगातार सूखे जैसी स्थिति है और पानी की समस्या से किसानों का बुरा हाल ऐसे मुद्दे हैं जो पवार के लिए चुनौती बन सकती है.

शरद पवार चुनावी जनसभाओं में ख़ुद को केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में पेश करते हैं और अपनी उपलब्धियां गिनाते हुए कहते हैं, "मेरे कार्यकाल में देश में अनाज का रिकार्ड उत्पादन हुआ, किसानों के कर्ज़ माफ़ किए गए हैं."

पवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, " भाजपा को विकास की नहीं राम मंदिर की पड़ी है और यह भी राम मंदिर उन्हें चुनाव के समय याद आता है. जीतने पर भाजपा राम को वनवास के लिए भेज देती है."

शरद पवार की स्थिति मज़बूत भले ही हो लेकिन उनके अपने समर्थक भी अनौपचारिक रूप से मानते हैं कि शायद इस बार जीत पहले जैसे रिकार्ड अंतर से नहीं होगी.

विरासत की सीट, पानी की समस्या

उधर विरासत में मिली 'सेफ़' सीट यानी बारामती से शरद पवार की बेटी सुप्रीया सुले के सामने सोलह प्रतिद्वंदी हैं जिनमें से छह महिलाएँ हैं. लेकिन पर्यवक्षेक मानते हैं कि सुप्रिया का मुक़ाबला भाजपा की कांता नलावडे से है.

सुप्रिया सुले कहती हैं, "शरद पवार के कार्यकाल में हुई उन्नति को मैं शिखर तक ले जाऊँगी."

सुप्रिया कहती हैं, "बहुत विकास हो चुका है और विकास का पैमाना यह है कि लोग कह रहे हैं कि पानी रोज़ आता लेकिन फ़िल्टर पानी चाहिए."

मगर क्षेत्र की पुरंदर तहसील में लोगों से बात करें तो लगता है सुप्रिया सुले किसी और ही क्षेत्र की बात कर रही हों.

कुछ मतदाताओं का कहना था, "यहां सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी के साथ-साथ खेतीबाड़ी के पानी की है और दूसरी बड़ी समस्या रोज़गार की कमी है."

देखने में बारामती और मढा दोनों जगहों पर मुक़ाबला कांटे का भले ही ना हो लेकिन लगता यही है कि उम्मीदवार आर्थिक मंदी और पानी की किल्लत की मार झेल रहे किसानों के ग़ुस्से की आंच से कुछ झुलसेंगे ज़रूर.