राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता पर मंडराता ख़तरा, क्या जा सकती है मेंबरशिप?

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- Author, सुचित्रा मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सूरत की एक अदालत ने चार साल पुराने आपराधिक मानहानि के मामले में दो साल की सज़ा सुनाई है.
कोर्ट ने 15 हज़ार का जुर्माना भी लगाया है. साथ ही सज़ा को 30 दिन के लिए स्थगित कर दिया है. यानी राहुल गांधी के पास सज़ा के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए एक महीने का समय है.
साल 2019 का ये मामला 'मोदी सरनेम' को लेकर राहुल गांधी की एक टिप्पणी से जुड़ा हुआ है जिसमें उन्होंने नीरव मोदी, ललित मोदी और अन्य का नाम लेते हुए कहा था, "कैसे सभी चोरों का सरनेम मोदी है?"
कोर्ट के इस फ़ैसले ने राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता पर संकट खड़ा कर दिया है और इस संकट की वजह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधान और सुप्रीम कोर्ट के दिए पुराने फ़ैसले हैं.
हाल ही में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के विधायक आज़म खान को एक हेट स्पीच मामले में तीन साल की सज़ा सुनाए जाने के बाद उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी.
सदस्यता जाने का डर कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी जताया है. अगर ऐसा होता है तो न सिर्फ़ राहुल गांधी बल्कि कांग्रेस पार्टी के लिए भी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी, क्योंकि राहुल गांधी लगातार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर संसद में अदानी विवाद को लेकर हमलावर रहे हैं.

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क्यों जा सकती है राहुल गांधी की सदस्यता?
अनुच्छेद 102(1) और 191(1) के अनुसार अगर संसद या विधानसभा का कोई सदस्य, लाभ के किसी पद को लेता है, दिमाग़ी रूप से अस्वस्थ है, दिवालिया है या फिर वैध भारतीय नागरिक नहीं है तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी.
अयोग्यता का दूसरा नियम संविधान की दसवीं अनुसूची में है. इसमें दल-बदल के आधार पर सदस्यों को अयोग्य ठहराए जाने के प्रावधान हैं.
इसके अलावा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किसी सांसद या विधायक की सदस्यता जा सकती है.
इस क़ानून के ज़रिए आपराधिक मामलों में सज़ा पाने वाले सांसद या विधायक की सदस्यता को रद्द करने का प्रावधान है.

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क्या कहता है लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(1) के मुताबिक़ दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना, रिश्वत लेना या फिर चुनाव में अपने प्रभाव का ग़लत इस्तेमाल करने पर सदस्यता जा सकती है.
उत्तर प्रदेश में रामपुर से विधायक आज़म खान की अक्टूबर 2022 में सदस्यता रद्द कर दी गई थी, क्योंकि उन्हें हेट स्पीच के मामले में कोर्ट ने तीन साल की सज़ा सुनाई थी. हेट स्पीच की वजह से ये मामला लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(1) के तहत आता है.
हालांकि मानहानि इसमें नहीं आती है.
धारा 8 (2) के तहत जमाखोरी, मुनाफ़ाखोरी, खाने-पीने की चीज़ों में मिलावट या फिर दहेज निषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराए जाने और कम से कम छह महीने की सज़ा मिलने पर सदस्यता रद्द हो जाएगी.
धारा 8 (3) के तहत किसी अगर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जाता है और उसे दो साल या उससे अधिक की सज़ा मिलती है तो वह सदन के सदस्य बने के योग्य नहीं रह जाएगा. अंतिम निर्णय सदन के स्पीकर का होगा.
प्रावधान के मुताबिक़, वह सांसद या विधायक दोषी ठहराए जाने की तारीख से ही अयोग्य घोषित माना जाएगा और उसकी रिहाई के छह साल तक वह अयोग्य बना रहेगा. इसका मतलब है कि अगर यह प्रावधान राहुल गांधी पर लगता है तो वे दो साल की सज़ा और उसके बाद छह साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.

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अदालत के फ़ैसले जो निर्णायक हो सकते हैं
लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013)
इस मामले में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि अगर कोई सांसद या विधायक किसी मामले में दोषी ठहराया जाता है और उसे दो साल या उससे अधिक समय के लिए जेल की सज़ा होती है तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी.
लीगल सर्विस इंडिया के मुताबिक़ कोर्ट ने इस मामले में यह भी कहा था कि सज़ायाफ्ता सांसद अपील लंबित रहने के दौरान न तो चुनाव लड़ सकता है और न ही विधायिका के सदस्य के रूप में पद पर बना रह सकता है.
मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014)
लीगल सर्विस इंडिया के मुताबिक़, इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उस पर आपराधिक आरोप लगाया गया है.
हालाँकि, अदालत ने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारना चाहिए.

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कैसे बचा सकते हैं सदस्यता?
क़ानून के जानकारों का कहना है कि अयोग्यता से बचने के लिए राहुल गांधी को हाई कोर्ट जाकर सज़ा को निलंबित करवाने का आदेश प्राप्त करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट के वकील विक्रम हेगड़े ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए कहा कि राहुल गांधी को अपनी सदस्यता बचाने के लिए ऊपरी अदालत से सज़ा पर रोक लगवानी होगी.
वहीं कांग्रेस पार्टी का कहना है कि सूरत कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ वह ऊपरी अदालत में अपील करेगी.

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वो अध्यादेश जो राहुल की सदस्यता बचा सकता था
सितंबर, 2013 में राहुल गांधी ने एक ऐसे अध्यादेश को बेतुका क़रार दिया था जो आज उनकी सदस्यता पर मंडराए संकट से उन्हें बचा सकता था.
उस वक्त यूपीए सरकार एक अध्यादेश लेकर आई थी जिसमें कहा गया था कि कुछ शर्तों के तहत अदालत में दोषी पाए जाने के बाद भी सांसदों और विधायकों को अयोग्य क़रार नहीं दिया जा सकेगा.
उस वक्त राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में उपाध्यक्ष थे. तब उन्होंने 'दाग़ी सांसदों और विधायकों' पर लाए गए यूपीए सरकार के अध्यादेश को 'बेतुका' क़रार देते हुए कहा था कि इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए.
बयान देते हुए तब राहुल गांधी ने कहा था, "इस देश में लोग अगर वास्तव में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं तो हम ऐसे छोटे समझौते नहीं कर सकते हैं."
राहुल गांधी का कहना था, ''जब हम एक छोटा समझौता करते हैं तो हम हर तरह के समझौते करने लगते हैं.''
अपनी बात रखते हुए राहुल गांधी ने तब कहा था, "इस अध्यादेश के लिए मेरे संगठन में जो दलील दी जा रही है वह यह है कि 'हमें ऐसा करने की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि इस पर एक राजनीतिक सहमति है.' अब समय आ गया है कि इस बेतुके काम को रोका जाए."

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किन्हें गंवानी पड़ी सदस्यता?
लक्षद्वीप से सांसद मोहम्मद फ़ैजल को हाल ही में 11 जनवरी, 2023 को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी. केंद्रशासित प्रदेश में एक अदालत ने उन्हें हत्या की कोशिश के मामले में दस साल की सज़ा सुनाई थी.
रशीद मसूद (कांग्रेस) को साल 2013 में एमबीबीएस सीट घोटाले में दोषी ठहराया गया और उन्हें राज्यसभा की अपनी सदस्यता गँवानी पड़ी.
लालू प्रसाद यादव को भी साल 2013 में चारा घोटाले में दोषी ठहराया गया और उनकी भी लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गई. उस समय वे बिहार में सारण से सांसद थे.
जनता दल यूनाइटेड के जगदीश शर्मा भी चारा घोटाले के मामले में दोषी ठहराए गए और 2013 में उन्हें भी लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी. उस समय वे बिहार के जहानाबाद से सांसद थे.
समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान को दोषी ठहराए जाने के बाद विधानसभा की सदस्यता गँवानी पड़ी थी. रामपुर की एक अदालत ने उन्हें वर्ष 2019 के एक हेट स्पीच के मामले में दोषी ठहराया था और तीन साल की सज़ा सुनाई थी.
सपा नेता आज़म ख़ान के बेटे अब्दुल्ला आज़म की भी विधानसभा सदस्यता रद्द हुई. चुनाव लड़ते समय उन्होंने अपनी उम्र अधिक बताते हुए ग़लत शपथपत्र दिया था.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के विधायक रहे विक्रम सैनी की भी सदस्यता ख़त्म कर दी गई थी. उन्हें 2013 के दंगा मामले में दो साल की सज़ा दी गई थी.
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