लिव-इन का रजिस्ट्रेशन, बच्चों की संख्या पर लगाम- कैसा हो सकता है यूनिफॉर्म सिविल कोड- प्रेस रिव्यू

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अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर छपी ख़बर के मुताबिक़ उत्तराखंड की बीजेपी सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने के लिए एक कमिटी का गठन किया है. कमिटी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड में क्या-क्या चीज़ें शामिल हों इसे लेकर लोगों से सुझाव मांगे थे और उसे सैंकड़ों सुझाव मिले हैं.
अख़बार के अनुसार लैंगिक समानता, महिलाओं के लिए शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करना, एलजीबीटीक्यू जोड़ों के लिए क़ानूनी अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन ये कुछ सुझाव है जो इस कमिटी को लोगों से मिले हैं. अख़बार का कहना है कि ये कमिटी आने वाले दिनों में अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी.
हालांकि इनमें से सबसे अहम कमिटी का वो सुझाव है जिसमें दंपत्ति कितने बच्चे पैदा करें इसकी संख्या में एकरूपता लाने की बात कही गई है. अख़बार लिखता है कि माना जा रहा है ये जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की बैकडोर एंट्री का एक तरीक़ा है.
अख़बार ने सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के आधार पर लिखा है कि पांच सदस्यों वाली इस कमेटी की सात महीने इस पर चर्चा चली और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व वाली इस कमिटी को कई हितधारकों से एक सुझाव मिला है कि दंपत्ति के लिए बच्चों की संख्या में एकरूपता होनी चाहिए.
एक सूत्र ने अख़बार को बताया, "कमिटी के पास कई सारे सुझाव आए हैं क्योंकि लोगों में जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंता है. लोग पूछ रहे हैं कि कैसे हम मानवाधिकार, बच्चों के लिए अधिकार और बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे. कमिटी रिपोर्ट बनाने से पहले हर सुझाव को गंभीरता से ले रही है."

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इस साल मई में गठित हुई इस कमिटी ने अब तक 1.5 लाख लोगों से सुझाव लिया है और आनेवाले तीन महीनों में इस पर एक रिपोर्ट सौंप सकती है. इस साल की शुरुआत में उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने सत्ता में लौटने के तुरंत बाद इस कमेटी का गठन किया था. उत्तराखंड चुनाव में बीजेपी ने यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने का चुनावी वादा किया था.
दंपत्ति कितने बच्चे पैदा करें इसमें एकरूपता लाने का सुझाव संघ के व्यापक जनसंख्या नियंत्रण नीति से मेल खाता है.
अक्तूबर में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में अपने वार्षिक विजयादशमी भाषण के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने "व्यापक जनसंख्या नियंत्रण नीति" की आवश्यकता की बात कही थी और कहा था कि "ये सभी पर समान रूप से" लागू होगी. इसके साथ ही कहा था कि "जनसंख्या असंतुलन" पर गंभीर नज़र रखना राष्ट्रहित में है.

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गुजरात चुनाव: कम मतदान के बीच चुनाव आयोग ने लोगों से की वोट की अपील
अंग्रेजी अख़बार द हिंदू में छपी एक ख़बर के मुताबिक़ गुजरात चुनाव के पहले चरण में हुए कम मतदान के बाद अब चुनाव आयोग ने शहरी वोटरों से दूसरे चरण में बढ़चढ़कर मतदान करने की अपील की है.
एक दिसंबर को हुए पहले चरण में 63.31 फ़ीसदी मतदान हुआ जो साल 2017 में 89 सीटों पर हुए मतदान के प्रतिशत से कम है. उस वक्त 89 सीटों पर 67.80 फीसदी मतदान हुआ था.
पहले चरण में सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात क्षेत्र के 19 ज़िलों को शामिल किया गया. सूरत, राजकोट और जामनगर में 63.3 फीसदी मतदान हुआ जो राज्य के बीते चुनाव में हुए औसत मतदान से कम है. चुनाव में मतदाताओं की उदासीनता को लेकर चुनाव आयोग की चिंता बढ़ गई है.
अख़बार लिखता है कि ये बेहद कम होता है कि चुनाव आयोग चुनाव के बीच में लोगों से मतदान की अपील करे.
आयोग ने ट्वीट कर पहले चरण में कम मतदान की भरपाई के लिए गुजरात के मतदाताओं से दूसरे चरण के दौरान बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की है.

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कश्मीर फ़ाइल्स विवाद: फ़िल्म फेस्टिवल के तीन जूरी सदस्यों ने कहा- हम लपिड से सहमत
दे टेलीग्राफ़ में छपी एक ख़बर के अनुसार, बीते सप्ताह गोवा इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल के चीफ़ ज्यूरी नदाव लपिड ने प्रतियोगिता में शामिल फ़िल्म 'कश्मीर फ़ाइल्स' को 'प्रोपोगैंडा' और 'भद्दा' बताया था. इस बयान पर विवाद के बीच जूरी बोर्ड के तीन सदस्यों ने कहा है कि वह लपिड के बयान से सहमत है.
इससे पहले इस जूरी में शामिल अकेले भारतीय फ़िल्मकार सुदीप्तो सेन ने कहा था कि नदाव लपिड ने मंच पर जो कहा था कि वो जूरी की राय नहीं थी.
हालांकि अब जूरी के तीन सदस्य- अमेरिकी निर्माता जिन्को गोतो, फ़्रांसीसी फ़िल्म एडिटर पास्कल चावांस और फ़्रांसीसी डॉक्यूमेंट्री मेकर जेवियर अंगुलो बारतरेन ने साझा बयान जारी कर लपिड के बयान का समर्थन किया है.
इस सप्ताह की शुरूआत में लपिड के इस बयान ने भारतीय मीडिया में काफ़ी सुर्खियां बटोरी थीं. ये विवाद इतना बड़ा हो गया कि नदाव लपिड की ओर से भारत में इसराइल के राजदूत नओर गिलोन ने भारत से माफ़ी मांगी और कहा कि भारत की मेज़बानी और दोस्ती के बदले लपिड के इस तरह का बयान देने पर वो शर्मिंदा हैं.
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