उत्तर प्रदेश: 12 साल की उम्र में रेप, बेटे की ज़िद पर 28 साल बाद जगी इंसाफ़ की आस

रेप पीड़िता
    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
  • प्रकाशित

28 साल पहले एक लड़की के साथ छह महीनों तक मोहल्ले के दो लोगों ने लगातार बलात्कार किया. तब उनकी उम्र 12 साल थी. वो गर्भवती हो गईं और उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया.

बेटा पैदा होने के बाद उनके जीवन में कई कठिन मोड़ आए. समाज ने भी उन्हें सहारा नहीं दिया.

लेकिन एक दिन जब उनके बेटे 13 साल के थे, तब उन्होंने माँ से पूछा- "मेरे पिता कौन हैं?"

बेटे की ज़िद का नतीजा है कि अब 28 साल बाद उनकी माँ के बलात्कारियों की पहचान और गिरफ़्तारी शुरू हुई है.

आइये जानते हैं, एक माँ-बेटे की समाज और क़ानून से संघर्ष की कहानी और कैसे लड़ रहे हैं वो इंसाफ़ की लड़ाई?

वीडियो कैप्शन, बलात्कार के खिलाफ़ कैसे लड़ी गईं ये लड़ाइयां?

नाबालिग़ लड़की से छह महीने तक लगातार बलात्कार

28 साल पुरानी इस दर्दनाक घटना के बारे में जानने के लिए बीबीसी ने रेप सर्वाइवर से उनके घर पर मुलाक़ात की. एक साधारण से किराए के घर में वो अपने दो बेटों और एक बहू के साथ रहती हैं.

1994 में वो महज़ 12 साल की थीं जब, "यह सिलसिला (बलात्कार का) छह महीने तक चला. उनको (अभियुक्त नक़ी और रज़ी को) जब भी वक़्त मिलता था वो बाउंड्री कूद कर चले आते थे. मुझे नहीं पता था यह सब क्या और क्यों हो रहा है."

लेकिन जब उनकी तबीयत ख़राब होने लगी तो उनकी बहन उन्हें डॉक्टर के पास ले कर गईं. चेकअप में पता चला कि वो गर्भवती हैं.

वो कहती हैं, "डॉक्टर ने पूछा कि मेरे साथ ऐसा किसने किया. मैंने कहा मैं नाम तो जानती नहीं हूँ लेकिन दो लोग आते हैं और वो मेरे साथ ऐसा करते हैं. दीदी ने कहा कि अबॉर्शन (गर्भपात) करवा देते हैं. लेकिन अबॉर्शन नहीं हो सकता था क्योंकि मेरी उम्र बहुत कम थी. उन्होंने कहा कि यह बच्ची ख़त्म हो जाएगी और हो भी नहीं सकता है अबॉर्शन."

रेप सर्वाइवर और उनके परिवार ने इस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाही लेकिन 27 सालों तक वो दहशत में जी रही थीं.

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छोटी सी उमर में...

वो कहती हैं, "उन्होंने जो दहशत मेरे दिल में बिठाई थी, जो मारपीट की थी, कट्टा लगा देना, धमकी देना, उन्होंने इतनी दहशत दी कि मैं इतने सालों के बाद शाहजहांपुर जाना ही नहीं चाहती थी. मैं डरी हुई थी क्योंकि उन्होंने मेरी बहन जीजा और परिवार को मारने की धमकी दी थी."

" उन्होंने धमकी दी कि तुमने अपना मुँह खोला तो पता भी नहीं चलेगा और पूरे घर में आग लगा देंगे. जल के मर जाओगे सब लोग. छोटी सी उमर में बच्चे में कोई ऐसा डर बैठा दे तो बच्चा तो वही करेगा ना? वो लोग इतना डरा देते थे कि अगर तुम्हारी ज़ुबान निकली तो तुम्हे यहीं ठोक देंगे. वो देसी कट्टा लिए घूमते थे."

वो कहती हैं कि उनका पुलिस में जाकर देश की सेवा करने का सपना था. लेकिन महीनों चले बलात्कार की घटना के बाद उनका सपना सिर्फ़ सपना ही रह गया.

वो कहती हैं, "मैं सहमी सी, छोटी सी, दुबली पतली सी थी. सातवीं में पढ़ती थी. जब मैं शाहजहांपुर अपनी बहन के साथ रहने गई तो मेरे बहुत सारे सपने थे. मेरा सपना था कि मैं बड़ी होकर पुलिस में जाऊँगी और देश की सेवा करूंगी. लेकिन उन दो लोगों की वजह से हमारे सारे सपने ख़त्म हो गए. मेरा स्कूल छूट गया. मैं पढ़ नहीं पाई."

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दहशत का माहौल

वो बताती हैं कि दहशत के इस माहौल से बचने के लिए वो अपनी बहन और जीजा के साथ रामपुर में बस गईं. रामपुर में ही 13 साल की उम्र में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया.

वो कहती हैं, "जिस बच्चे के लिए मैंने इतनी तकलीफ़ उठाई थी. इतना दुष्कर्म झेला, मैंने उसका चेहरा भी नहीं देखा. जब मुझे होश आया, तब मैंने पूछा कि बच्चा कहाँ है तो मम्मी ने कहा कि अब वो तुम्हें ज़िंदगी में कभी नहीं मिलेगा."

फिर साल 2000 में उनके जीवन में एक नया मोड़ आया. उनकी शादी हुई जिससे उन्हें एक और बेटा हुआ. वो बताती हैं, "शादी करने के बाद मैं अपने ससुराल गई. मेरी ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा था. मैं उस घटना को पूरी तरह से भूलना चाहती थी. मैं नहीं चाहती थी कि जो हो चुका है, वो कभी दोबारा दोहराया जाए."

लेकिन शादी के छह साल बाद उनके साथ हुई एक घटना ने एक बार फिर उनकी ज़िंदगी को झटका दिया.

वो बताती हैं, "पता नहीं मेरे पति को कैसे इसकी जानकारी हो गई कि मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ है. उन्होंने सारा का सारा दोष मेरे ऊपर डालकर लड़ाई झगड़ा शुरू कर दिया. मेरी एक भी नहीं सुनी. फिर एक दिन मुझे घर से निकाल दिया और मैं अपने दूसरे बच्चे को लेकर अपनी बहन के पास लौट आई."

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13 साल बाद पहली बार मिले मां बेटे

इस बीच उनके पहले बेटे को एक परिवार ने गोद ले लिया था. लेकिन किसी तरह यह बात बाहर आ गई कि वो अपने दत्तक माता-पिता का बेटा नहीं है.

वो अपने बेटे के बारे में कहती हैं, "उसे गाँव में लोग कहते थे कि जिसे तुम मम्मी बोलते हो, पापा बोलते हो, वो तुम्हारे नहीं हैं. उनको पता चला कि इस तरह का मामला है. किसी मुस्लिम का बच्चा है तो वो लोग भी उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगे कि पता नहीं किसका ख़ून है."

और फिर एक दिन 13 साल बाद अस्पताल में एक दूसरे से अलग किये किए गए माँ-बेटे फिर मिले.

बच्चे को गोद लेने वाले परिवार ने उसे उनकी माँ को लौटा दिया.

उस लम्हे को याद करते हए वो कहती हैं, "जब मेरा बच्चा मेरे पास लौट आया तब मैंने उसको पहली बार देखा. वो मेरे साथ रहने लगा."

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'बहुत डिप्रेस रहता था'

लेकिन मां से मिलने के बाद भी बेटा मायूस और परेशान रहता था.

वो कहती हैं, "वो छोटा सा बच्चा, बहुत डिप्रेस रहता था. स्कूल नहीं जाता था, क्योंकि स्कूल में बच्चे चिढ़ाते थे. जिनको हमने बच्चे को गोद दिया था, वो पिता का नाम ही देने के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने कहा कि मैं नाम अपना क्यों दूँ. उन्होंने अपना नाम नहीं दिया. उसका एडमिशन होता था तो कहते थे पिता का नाम बताइए. हम बता नहीं सकते हैं कि कितने संघर्ष और ज़लालत वाली ज़िन्दगी जी है हम दोनों ने."

बेटा जानना चाहता था कि उसके पिता कौन हैं.

वो बताती हैं, "वो कहता है, मैं इस तरीक़े से आया हूँ इस दुनिया में? ज़बर्दस्ती लाया गया हूँ? ना मेरा कोई पिता है, ना मेरी कोई पहचान है. ऐसी पहचान का मैं क्या करूंगा?"

माँ-बेटे के लिए समाज में उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया था.

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बेटे के सवाल

बेटा अपने पिता और अपने अस्तित्व को लेकर अपनी मां से लगातार सवाल करता था.

बेटे से होने वाली बहस के बारे में वो बताती हैं, "एक बेटा अपनी माँ से कहता था, सबके पिता हैं, वो मेरे पिता नहीं हैं, वो मेरी माँ नहीं हैं. आप मेरी माँ हो, आप मुझे बस यह बता दीजिए कि मेरे आगे सरनेम क्या लगेगा?"

वो कहती हैं कि वो इतना मायूस हो गया कि उसने आत्महत्या करने की कोशिश भी की.

वो कहती हैं, "बचपन में तो मैं उसे डांट देती थी. लेकिन धीरे-धीरे जब वो बड़ा होता गया वो डिप्रेशन में जाने लगा. कहता था कि यह बेनाम ज़िन्दगी मैं नहीं जी सकता हूँ. मैं सुसाइड कर लूँगा. आप मुझे साफ़-साफ़ बताइये कि क्या बात है? जब वो आत्महत्या करने की कोशिश करने लगा, तो हम लोगों ने उसे बचाया, समझाया, और सारी घटना बताई."

सब कुछ जानने के बाद बेटे ने कहा, "आपकी ग़लती कहाँ पर है? मेरी ग़लती कहाँ पर है? आपने अपनी सज़ा काट ली. आप इतने सालों से इस कलंक के साथ जी रही हैं, मेरी भी ज़िंदगी आपने तबाह कर दी. जिसने किया है, सज़ा पहले उसे मिलनी चाहिए ना. हम लोग क्यों दुनिया से ऐसे कटे-कटे रहें?"

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बेटे से मिला हौसला

वो कहती हैं, "बेटे ने मुझसे कहा कि मम्मी चाहे जो कुछ भी हो जाए हमें यह लड़ाई लड़नी ही है और मुझे उनको सबक़ सिखाना ही है. उसने कहा कि हो सकता है कि उसने किसी और के साथ भी ऐसा किया हो. अगर आप सामने आयेंगी तो हो सकता है और भी लोग सामने आएंगे. उससे हमारा केस मज़बूत होगा और उनको सज़ा मिलेगी. समाज में एक मैसेज जायेगा कि गुनाह करने के बाद कोई बच नहीं सकता है."

बेटे से हौसला मिलने के बाद उन्होंने साल 2020 से शाहजहांपुर जाना शुरू किया. लेकिन वापस लौटना उनके लिए आसान नहीं था.

वो कहती हैं, "मैं 20-25 साल बाद शाहजहांपुर गई अपनी रिपोर्ट लिखाने और वो भी मैं बहुत डरते-डरते गई. मुझे लग रहा था कि कहीं वो फिर ना हमको देख लें और फिर वो ऐसा कुछ ना करें."

जब वो 2020 में शाहजहांपुर पहुँची तो उन्हें यह नहीं मालूम था कि एक नए क़ानूनी संघर्ष की शुरुआत होने जा रही है.

वो कहती हैं, "एफ़आईआर कराने की बहुत कोशिश की. सीधे थाने से नहीं हो पाई. जब वो अदालत में जाने के लिए वकील से मिलीं तो वकील ने कहा, इतना पुराना मामला है. कहाँ से ढूंढेंगे, और आप कैसे साबित करेंगी कि आप इस सन में वहां पर रहती थीं. जिस घर में मैं रहती थी, मुझे वो भी नहीं मिल रहा था. उसको भी मैं नहीं ढूंढ पा रही थीं."

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आसान नहीं था केस दर्ज कराना

"अभियुक्तों का भी पता नहीं चल रहा था. सब कुछ बदल चुका था. जब हम एफ़आईआर दर्ज करवाने बार-बार जाते, बार-बार लौट आते तो वकील साहब कहते थे कि मैडम इसमें कुछ है नहीं, आप वापस चली जाइए. लेकिन मैंने कहा मेरे क़दम उठ चुके हैं और मैं इंसाफ़ लेकर रहूंगी."

उन्होंने वकील से कहा, "आपको सबूत हम लाकर देंगे. आप हमारा मुक़दमा ले लीजिये."

फिर उन्होंने अदालत में अर्ज़ी डाली. फिर शाहजहांपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर मार्च 2021 में शहर के थाना सदर बाज़ार में मुक़दमा दर्ज हुआ जिसमें दो लोग हसन उर्फ़ ब्लेडी ड्राइवर और उसका भाई गुड्डू अभियुक्त बनाए गए.

लेकिन फिर भी 28 साल पुराने मामले में नए सिरे से जांच शुरू करना आसान नहीं था.

वो बताती हैं, "पुलिसवालों ने हमसे कहा कि आप (अभियुक्तों को) ढूंढ कर लाइए. तो हम ख़ुद पता करने गए. मैंने उसे ढूंढा और मेरी उससे फ़ोन पर बात भी हुई. उसने मुझे पहचान भी लिया. उसने बोला तुम्हीं बोल रही हो ना? हमने कहा हम ही बोल रहे हैं. दोनों भाइयों से मेरी बात हुई. बोलने लगे कि तुम अभी ज़िंदा हो. मरी नहीं हो? हमने कहा कि मरे नहीं हैं, अब तुम्हारे मरने की बारी है."

केस को लेकर वो कहती हैं, "सत्य कभी छुप नहीं सकता है. जो सच है वो सामने आकर ही रहेगा और इसी तरीक़े से आज मैं इस मुक़ाम पर पहुँची हूँ."

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डीएनए जांच से पकड़ में आए अभियुक्त

पुलिस और पीड़िता ने अभियुक्तों को ढूंढ निकाला लेकिन उन्हें जांच के दायरे में लाने के लिए डीएनए टेस्ट करवाना ज़रूरी था.

वो कहती हैं, "जब एफ़आईआर दर्ज होने ही वाली थी पुलिस को मैंने कांटेक्ट नंबर दिए और उसके बाद मैंने डीएनए टेस्ट के लिए बुलवाया. और बाद में नक़ी हसन की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई. हालांकि मुझे नहीं पता था कि (बेटा) किसका है, क्योंकि दोनों बारी-बारी से (दुष्कर्म) करते थे."

इस मामले को लेकर बीबीसी को शाहजहांपुर के एसएसपी एस आनंद ने बताया, "यह मामला बिलकुल अप्रत्याशित था. जब महिला सामने आई और उसने मुक़दमा दर्ज करवाया तो हम लोग काफ़ी हैरान थे. लेकिन हमने एक मौक़ा लिया. और पहले बेटे का डीएनए लेकर शुरुआत की."

पिछले एक साल से मामले की जांच कर रहे इंस्पेक्टर धर्मेंद्र कुमार गुप्ता ने बताया, "पहले अभियुक्तों को नोटिस देकर थाने बुलाया. बुलाने के बाद इनका डीएनए सैंपल लिया. सैंपल लेने के बाद डीएनए मिलान के लिए सैंपल भेजा. तो फ़रवरी 2022 में डीएनए का सैंपल मिलान होके आया. क्योंकि ये इतनी पुरानी घटना थी तो सीधे जेल नहीं भेजा जा सकता था. महिला ने मेडिकल के लिए भी मना कर दिया था, क्योंकि 20-25 साल बाद मेडिकल में कुछ आना ही नहीं है."

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'ज़िन्दगी उन्होंने मेरी तबाह की है'

आख़िरकार 31 जुलाई 2021 को पुलिस ने अभियुक्त रज़ी को गिरफ़्तार किया.

एसएसपी एस आनंद कहते हैं, "जब रज़ी की गिरफ़्तारी हुई तो हम लोगों की तरह वो भी हैरान था कि कहाँ से यह इतने साल पुराना मामला सामने आया."

तो क्या उसने गुनाह क़बूल किया ? एसएसपी एस आनंद कहते हैं, "हाँ."

पहली गिरफ़्तारी के बाद बेटे ने माँ से कहा, "मुझे बहुत ख़ुशी है. मुझे डबल ख़ुशी तब होगी जब वो दूसरा वाला (नक़ी) पकड़ा जायेगा."

हो सकता है कि आने वाले समय में वो अदालत में अभियुक्तों के आमने सामने आएं.

वो कहती हैं, "अगर कोर्ट में मेरा उनसे आमना सामना होता है तो मेरी तो एक ही इच्छा है, दोनों को दो चांटे मारने की. जो ज़िन्दगी उन्होंने मेरी तबाह की है. उसके लिए कोई भी सज़ा कम है. कोशिश करेंगे कि कड़ी से कड़ी सज़ा मिले."

पत्रकार कंवरदीप सिंह
इमेज कैप्शन, पत्रकार कंवरदीप सिंह

कैसे आया मीडिया में यह मामला?

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के बरेली संवाददाता कंवरदीप सिंह कहते हैं कि उन्हें इस मामले के बारे में 2021 में पता चला जब रेप सर्वाइवर के प्रार्थना पत्र पर पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज की.

इस मामले पर एक साल से ज़्यादा समय से लगातार रिपोर्टिंग करते आ रहे कंवरदीप का कहना है, "जब मैंने एफ़आईआर पढ़ी तब मुझे यह शिकायत जेनुइन लगी. हम रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में कई सारी शिकायतें देखते हैं. तो इसे देख कर मुझे सच में लगा कि यह एक जेनुइन केस है. फिर मैंने एसएसपी से और स्थानीय एसएचओ से कहा कि प्लीज़ इस मामले को देखें क्योंकि यह जेनुइन लग रहा है."

कंवरदीप कहते हैं, "मैंने फिर रेप सर्वाइवर से और उनके बेटे से बात की और हमसे जितना हो सका, उसे हमने मीडिया में कवर किया. हमने देखा है कि ऐसे मामलों में हम सोच भी नहीं सकते हैं कि एफ़आईआर भी दर्ज होती है. लेकिन इसमें तो इंसाफ़ मिलने लगा."

कंवरदीप कहते हैं, "मैं तो कहूंगा कि उनको इंसाफ़ दिलाने में उनके बेटे का अहम रोल था. बाक़ी हम तो सिर्फ़ अपनी रिपोर्टिंग कर रहे थे. इससे ज़्यादा हम क्या कर सकते थे."

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कैसे जी रहा है परिवार?

अब जब गिरफ़्तारियां हो रही हैं और इंसाफ़ मिलता नज़र आ रहा है तब वो कहती हैं, "मैं काम कर रही हूँ. मेरा बेटा भी काम कर रहा है. छोटा वाला अभी पढ़ रहा है. उसको मुझे आईएएस बनाना है. बड़ा वाला तो नहीं पढ़ पाया क्योंकि बचपन से ही स्कूल जाता था तो प्रॉब्लम होती थी. आइडेंटिटी कहां से लाएं उसकी. तो वो भी नहीं पढ़ पाया है. और रही बात परिवार की तो मैं अपने परिवार के साथ खुश हूँ. दोनों बच्चों के साथ ख़ुश हूँ. एक अच्छा परिवार है. काम कर लेते हैं और घर ख़र्च चल जाता है."

वो कहती हैं, "मेरे बड़े बेटे ने मुझे इतना मजबूर कर दिया है कि मम्मी इनको सज़ा दिलानी ही है. मेरे बेटे ने मुझे बहुत सहारा दिया और कहा कि आप लड़िये हम आपके साथ में हैं."

लेकिन क्या यह परिवार कभी भी इस घटना और उसकी वजह से मिली सालों की यातना से उभर पाएगा?

इस पर वो कहती हैं, "बात तो बहुत पुरानी हो चुकी है लेकिन जो घाव उन्होंने हमें दिए हैं वो आज तक भरे नहीं हैं. आज भी हमारी ज़िन्दगी थम सी गई है. और वो पल बार-बार याद आता है. तो सोचते हैं कि ऐसे भी भेड़िये होते हैं जो अपने स्वार्थ के लिए किसी बच्ची की ज़िन्दगी बर्बाद कर देते हैं. सबकी अपनी ज़िंदगी होती है, सबको ऊपर वाले ने जीने का हक़ दिया है. मैं इसलिए दोबारा सामने आई हूँ कि लोगों को सबक मिले."

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वो कहती हैं, "28 साल पहले जब मेरे साथ यह सब हुआ था तब मीडिया, मोबाइल कुछ नहीं था. आपको ख़ुद थाने जाना पड़ता था. अब तो आप घर बैठे बुला सकती हैं."

अपने संघर्ष से वो दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा देना चाहती हैं और कहती हैं, "आप उसके ख़िलाफ़ लड़िए, उसकी एफ़आईआर दर्ज कराइए. दूसरे की माँ बहनों के साथ में ऐसा दुष्कर्म करने की हिम्मत ना हो. लोग चुप्पी साध के बैठ जाते हैं. मैं भी चुप्पी साध कर बैठ गई थी. मैंने भी सोचा था कि पता नहीं शायद यही क़िस्मत में लिखा हो. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. कोई आपके साथ जानबूझकर ऐसा करके जाए तो वो क़िस्मत में लिखा नहीं होता है. पुलिस में ज़रूर जाएँ ताकि उसकी आगे हिम्मत ना पड़े कि वो किसी और के संग ऐसा कुछ कर पाए."

अंत में वो कहती हैं, "पुलिस प्रशासन का पूरा समर्थन मिला है. एक पकड़ा भी गया है, दूसरा भी ज़रूर पकड़ा जाएगा."

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