महिला कुली जिन्होंने 1938 में किया था दलित महिलाओं का बड़ा सम्मेलन

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महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में जाईबाई चौधरी का जन्म दो मई, 1892 को एक दलित परिवार में हुआ था.

उनकी शादी महज नौ साल की उम्र में हो गई और परिवार को पालने के लिए उन्हें रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करना पड़ा. लेकिन एक दिन मिशनरी नन ग्रेगॉरी ने जाईबाई को भारी बैग उठाते हुए देखा.

बातचीत करने पर ग्रेगॉरी को जाईबाई औसत की तुलना में तेज़ बुद्धि की लगीं और यहीं से जाईबाई के जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई.

नन ग्रेगॉरी की मदद से जाईबाई का स्कूल में दाख़िला हुआ और बाद में उनकी मदद से ही जाईबाई को एक मिशनरी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिली.

हिस्लॉप कॉलेज, नागपुर की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. अभिलाषा राउत जाईबाई के जीवन और संघर्ष के बारे में कहती हैं, "जाईबाई अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद टीचिंग का काम करने लगीं, लेकिन अभिभावकों को पसंद नहीं था कि एक दलित टीचर उनके बच्चों को पढ़ाए. उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया, जिसके बाद स्कूल प्रशासन ने जाईबाई को नौकरी से निकाल दिया. इससे वे काफ़ी दुखी हुईं, लेकिन फिर उन्होंने फ़ैसला लिया कि वे लड़कियों की शिक्षा के लिए कुछ करेंगी और उन्होंने इसके बाद अपना स्कूल खोला."

जाईबाई हार मानने वालों में से नहीं थीं. उन्होंने नागपुर में दलित और ग़रीब लड़कियों के लिए स्कूल खोला. इस स्कूल का नाम था 'संत चौखामेला गर्ल्स स्कूल. जाईबाई केवल लड़कियों को स्कूली शिक्षा देने तक सीमित रही हों, ऐसा नहीं है. उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए भी काम किया और कई बार अपनी जाति की वजह से उन्हें विरोध का सामना भी करना पड़ा.

लेखिका अनिता भारती ने जाईबाई से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया, "साल 1937 में ऑल इंडिया वीमेन कॉन्फ़्रेंस का आयोजन हुआ. एक शिक्षिका और दलित एक्टिविस्ट के तौर पर जाईबाई को भी इसमें भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया. कॉन्फ़्रेंस में जब खाने का समय हुआ, तो उच्च जातियों की महिलाओं ने उन्हें अलग बैठने को कहा और उन्हें अलग से खाना दिया."

"इस पर जाईबाई और उनकी सहेली काफ़ी ग़ुस्सा हुईं और उन्होंने ये निश्चय किया कि वो उनके कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होंगी, क्योंकि ये लोग भेदभाव, छुआछूत और ऊंची जाति वाला रवैया कभी नहीं छोड़ सकतीं. इसी के विरोध में उन्होंने एक जनवरी 1938 को दलित महिलाओं का एक बड़ा सम्मेलन किया और दलित महिलाओं की आवाज़ उठाने में कामयाब भी रहीं."

जिस स्कूल की शुरुआत जाईबाई ने साल 1922 में की थी अब वह उच्च माध्यमिक स्कूल बन गया है. हालांकि, उसका नाम बदलकर जाईबाई चौधरी ज्ञानपीठ स्कूल कर दिया गया है. जाईबाई की रिश्तेदार डॉ. शिल्पा चौधरी ने बीबीसी को इस स्कूल के बारे में बताते हुए कहा, "शिक्षा के जो बीज हज़ारों लड़कियों के दिमाग़ में बोए, वो बीज अब बड़े पेड़ों में तब्दील हो चुके हैं. जाईबाई की छात्राएं भी अब अपनी बेटियों के लिए शिक्षा के महत्व को समझती हैं. वे चाहती थीं कि उनकी छात्राएं पढ़ें और उनके काम को आगे लेकर जाएं."

रिपोर्ट- अनघा पाठक, सिरीज़ प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह

(बीबीसी लाई है हमारी पुरखिन की दूसरी सिरीज़ जिसमें हम आपको बता रहे हैं आठ ऐसी दमदार महिलाओं की कहानियाँ जिन्हें हाशिए पर रहना मंज़ूर नहीं था. सिरीज़ की पांचवी कड़ी में पढ़िए खासी जाति से आने वाली सिल्वरीन स्वेर की कहानी जिन्होंने शिक्षा और स्काउट्स एंड गाइड्स के ज़रिए लड़कियों को नई राह दिखाई.)

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