सेना भर्ती घोटाला: लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के 6 अधिकारियों पर सीबीआई ने कसा शिकंजा- प्रेस रिव्यू

भारतीय सैनिकों की फाइल फोटो

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टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर के मुताबिक, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) के ज़रिए सैन्य अधिकारियों के चयन में कथित भ्रष्टाचार के मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के छह अधिकारियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी ख़बर में लिखा है कि लेफ्टिनेंट कर्नल भगवान, जो फ़िलहाल अध्ययन अवकाश पर हैं और उनके साथ नायब सूबेदार कुलदीप सिंह एसएसबी सेंटर्स पर धांधलियों में शामिल थे. ख़बर के मुताबिक आर्मी एयर डिफेंस कोर में लेफ्टिनेंट कर्नल भगवान, आर्मी भर्ती रैकेट के कथित सरगना हैं.

सीबीआई ने इस मामले के सिलसिले में कई जगहों पर छापे मारे हैं और 23 सेना-कर्मियों और आम नागरिकों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है. इन सभी पर सेना में भर्ती के लिए रिश्वत लेने का आरोप है.

भारतीय सेना में ब्रिगेडियर (सतर्कता) वीके पुरोहित ने इस साल 28 फ़रवरी को आरोप लगाया था कि नई दिल्ली स्थित बेस-हॉस्पिटल में मेडिकल एग्ज़ाम में फेल हुए उम्मीदवारों को रिश्वत लेकर पास किया जाता है. उसके बाद सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है. माना जा रहा है कि सेना भर्ती घोटाले की जांच के दायरा बढ़ सकता है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बाबरी मस्जिद और राम मंदिर की याद दिलाई

राजनाथ सिंह

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इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पार्टी पदाधिकारियों से लोगों को याद दिलाने के लिए कहा है कि बीजेपी जब पहली बार अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई, तब बाबरी मस्जिद गिरी और दूसरी पारी में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो रहा है.

ख़बर के मुताबिक, अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी के प्रचार की बुनियाद तैयार करते हुए राजनाथ सिंह ने सोमवार को लखनऊ में पार्टी पदाधिकारियों से कहा , ''ढांचा (बाबरी मस्जिद का) जब गिरा, कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और जब राम मंदिर की आधारशिला रखी गई, तब योगी जी मुख्यमंत्री है. ये एक संयोग है...बीजेपी की एक सरकार तब थी, बीजेपी की एक सरकार अब है.''

राजनाथ सिंह ने कहा कि बीजेपी में भरोसे को लेकर कोई संकट नहीं है, पार्टी ने राम मंदिर बनाने का और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का अपना वादा पूरा किया है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पार्टी नेताओं से कहा है कि वो अपने कार्यकर्ताओं से राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रचार के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल सुनिश्चित कराएं.

आईआईएम में ओबीसी और एससी के लिए 60 प्रतिशत से ज़्यादा पद खाली

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द हिंदू में छपी ख़बर के मुताबिक, केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों की फैकल्टी में अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के पद बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं.

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने सोमवार को लोकसभा में एक सवाल के लिखित जबाव में बताया कि केंद्र सरकार के उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित पदों में आधे से अधिक पद खाली हैं.

इसी तरह अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित पदों में से लगभग 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं.

भारतीय प्रबंध संस्थानों (आईआईएम) की फैकल्टी में एससी और ओबीसी के 60 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं, जबकि एसटी के 80 प्रतिशत से ज़्यादा पद भरे नहीं हैं.

आईआईटी संस्थानों ने इस बारे में केवल नॉन-फैकल्टी पदों की जानकारी दी है. आईआईएम और आईआईटी संस्थान ये मांग करते रहे हैं कि उन्हें फैकल्टी में आरक्षण आधारित चयन से छूट दी जानी चाहिए.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने जून 2019 में देश के सभी विश्वविद्यालयों से छह महीने के भीतर रिक्त पदों को भरने के लिए कहा था और चेतावनी दी थी कि ऐसा नहीं करने पर उन्हें मिलने वाला अनुदान रोक दिया जाएगा. लेकिन इसके बावजूद 42 विश्वविद्यालयों में कुल 6,074 पद खाली हैं जिनमें 75 प्रतिशत आरक्षिण क्षेणी के हैं.

आरक्षण की 50 फीसद की अधिकतम सीमा पर पुनर्विचार की जरूरत पर सुप्रीम कोर्ट में मंथन

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दैनिक जागरण की ख़बर के मुताबिक, ''सोमवार को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में 28 साल पहले इंदिरा साहनी फैसले में तय की गई आरक्षण की अधिकतम 50 फीसद सीमा पर पुनर्विचार की जरूरत पर सुनवाई शुरू हुई. केरल की ओर से चुनाव की दुहाई देते हुए सुनवाई टालने का अनुरोध किया गया, लेकिन कोर्ट ने मांग ठुकरा दी और सुनवाई शुरू कर दी.''

ख़बर में कहा गया है कि ''सबसे पहले महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखा गया जिसमें इंदिरा साहनी के फैसले को पुनर्विचार के लिए 11 न्यायाधीशों की पीठ को भेजने का विरोध किया गया. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि आरक्षण की 50 फीसद सीमा लक्ष्मण रेखा है और सभी राज्यों को इसका पालन करना चाहिए. इस पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है क्योंकि इंदिरा साहनी फैसले के बाद पांच बार संविधान पीठ ने उस फैसले को अपनाया है और कभी भी आरक्षण की 50 फीसद सीमा पर सवाल नहीं उठाया.''

याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस मंगलवार को भी जारी रहेगी.

ख़बर के मुताबिक, ''आठ मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने छह कानूनी सवाल तय किए थे जिनमें कोर्ट विचार करेगा कि क्या आरक्षण की तय अधिकतम 50 फीसद सीमा पर पुनर्विचार की जरूरत है. क्या 50 फीसद सीमा तय करने वाले इंदिरा साहनी फैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए. इस पर भी विचार होना है कि क्या संविधान के 102वें संशोधन के बाद से राज्यों का पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का कानून बनाने का अधिकार बाधित हुआ है और क्या इससे संविधान में दी गई संघीय ढांचे की नीति प्रभावित हुई है.''

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